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Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 कई राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है। इस बार मुकाबला भले ही कड़ा हो, लेकिन संकेत साफ हैं—नुकसान किसी का भी हो, नीतीश कुमार फिर भी फायदे में दिख रहे हैं। समझिए इस खास रिपोर्ट में कि ऐसा क्यों और कैसे संभव है।
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उदय चंद्रा, पटना: बिहार चुनाव के एग्जिट पोल और टीवी डिबेट्स के बीच राज्य की राजनीति एक नई कहानी लिखती दिख रही है। सीट बंटवारे को लेकर गठबंधनों के भीतर खींचतान जारी रही, वहीं महागठबंधन में सीएम और डिप्टी सीएम चेहरे के ऐलान के बाद इंडिया गठबंधन की जीत की संभावनाएं कमजोर पड़ती नजर आ रही हैं। इस बार मुकाबला त्रिशंकु विधानसभा की ओर बढ़ता दिख रहा है।
क्या प्रशांत किशोर बनेंगे बिहार के नए चाणक्य 2.0?
जन सुराज पार्टी NDA और महागठबंधन, दोनों के बीच तीसरी ताकत के रूप में उभर रही है। अगर पार्टी 6% वोट हासिल करने में कामयाब होती है, तो करीब दो दर्जन सीटों के समीकरण बदल सकते हैं — जिससे दोनों बड़े गठबंधनों की राह मुश्किल हो सकती है।
नीतीश कुमार: बिहार की सियासत के चाणक्य 2.0
दो दशकों से नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति में ऐसी चालें चली हैं, जिन्होंने लालू यादव से लेकर नरेंद्र मोदी तक — सबको कभी करीब, तो कभी दूर रखा। न वंशवाद के आगे झुके और न ही राष्ट्रवाद की लहर में बह गए। 2013 में उन्होंने एनडीए से नाता तोड़कर कम्युनलिज्म का विरोध किया, तो 2017 में भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच सुशासन की छवि बनाए रखने के लिए फिर उसी गठबंधन में लौट आए।
जब 2005 में उन्होंने सत्ता संभाली, तब बिहार विकास की राह से कोसों दूर था — सड़कों, बिजली और सुरक्षा, सबकी कमी थी। लेकिन आज स्थिति पलट चुकी है। सड़कें दोगुनी, बिजली लगभग हर घर तक, और लड़कियों की शिक्षा में साइकिल योजना ने क्रांति ला दी। महिलाओं के सशक्तिकरण और शराबबंदी जैसे फैसलों ने नीतीश को एक अलग ‘गुड गवर्नेंस’ ब्रांड बना दिया है — एक ऐसा नेता, जो हर सियासी फेरबदल के बाद भी फायदे में रहता है।
वर्ष 2005 से पहले का वो दिन आप सब को याद होगा जब जर्जर सड़कें बिहार की पहचान बन गईं थीं। राज्य के किसी भी हिस्से में आने-जाने में लोगों को सोचना पड़ता था। थोड़ी दूरी का सफर तय करने में भी लोगों को घंटों लग जाते थे। सड़कों पर हिचकोले खाती गाड़ियां और मन में भय लेकर लोग सफर करने को मजबूर थे। सड़क में गड्ढा था या गड्ढे में सड़क, यह तय कर पाना मुश्किल था। किसी गांव में यदि किसी व्यक्ति की तबीयत खराब हो जाती थी, तो इलाज के लिए अस्पताल तक पहुंचने से पहले कई लोग रास्ते में ही दम तोड़ देते थे। नदियों, नालों और नहरों पर पुल-पुलिया नहीं होने के कारण सीतामढ़ी, शिवहर जैसे राज्य के कई जिलों का संपर्क राजधानी पटना से टूट जाता था। नदी, नालों और नहरों पर पुल-पुलिया नहीं होने की वजह से गांवों-कस्बों के लोग पूरी बरसात में जल कैदी बन जाते थे। छात्र-छात्राएं बरसात के दिनों में महीनों तक स्कूल नहीं जा पाते थे। उस वक्त मैं तत्कालीन केंद्र सरकार में मंत्री था। जब भी बिहार आता था और अपने क्षेत्र में जनता से मिलने जाता था तो सड़कों के अभाव में कई किलोमीटर तक पैदल ही चलना पड़ता था। ऐसा भी सुनने में आता है कि पहले जिन लोगों के हाथ में राज्य की सत्ता थी, वे कहते थे कि राज्य में अच्छी सड़कें बन जाएंगी तो पुलिस जल्दी गांवों में पहुंच जाएगी और अपराधी पकड़े जाएंगे। इसका मतलब ये कि वे खुद भी अपराध को संरक्षण देते थे।
वर्ष 2005 से पहले राज्य में बहुत कम सड़कें थीं और जो सड़कें थीं उनका बुरा हाल था। सड़कों के मेंटेनेंस की कोई उचित व्यवस्था नहीं थी। सड़कों के मेंटेनेंस के नाम पर खूब भ्रष्टाचार होता था। अलकतरा घोटाला भी उसी वक्त हुआ था। 2005 से पहले गंगा नदी पर मात्र 4 पुल, कोसी नदी पर 2 पुल, गंडक नदी पर 4 पुल, सोन नदी पर 2 पुल थे जो 1990 के काफी पहले बने थे। वर्ष 2005 से पहले पूरे राज्य में मात्र 11 रेल ओवरब्रिज (आर॰ओ॰बी॰) थे, जिसके चलते कई जगहों पर घंटों जाम की स्थिति होती थी। राज्य की ग्रामीण बसावटों को बारहमासी संपर्कता प्रदान करने की कोई ठोस योजना नहीं थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना लागू की थी, जिसमें एक हजार या उससे अधिक आबादी वाली बसावटों को ही जोड़ने की योजना थी, लेकिन तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा इस पर ध्यान नहीं दिया गया। सड़कों के लिए भू-अर्जन नहीं किया गया, जिस कारण यह योजना भी आंशिक रूप से ही कार्यान्वित हो सकी। 24 नवंबर 2005 को राज्य में नई सरकार के गठन के बाद प्राथमिकता के आधार पर नई सड़कों का निर्माण कराया गया, पुरानी सड़कों का जीर्णोद्धार एवं चौड़ीकरण कराया गया तथा पुल एवं पुलियों का जाल बिछाया गया। बड़े पैमाने पर बने पथों के रख-रखाव के लिए एक विशिष्ट दीर्घकालीन अनुरक्षण नीति लागू की गई। वर्ष 2005 में हमलोगों की सरकार बनने के बाद राज्य में लगभग 20 नए बड़े पुल बनाए गए। इसमें गंगा नदी पर भोजपुर में वीर कुंवर सिंह सेतु, पटना में जे॰पी॰ सेतु, मुंगेर में श्रीकृष्ण सिंह सेतु, पटना से राघोपुर दियारा को जोड़ने वाली कच्ची दरगाह-राघोपुर सिक्स लेन पुल, औंटा-सिमरियाधाम पुल के निर्माण के साथ ही बक्सर स्थित वीर कुंवर सिंह पुल पर अतिरिक्त 2 लेन का निर्माण कराया गया। गंगा नदी पर 10 नए पुलों का निर्माण कार्य जारी है। वहीं कोसी नदी पर कोसी महासेतु समेत 3 नए पुलों का निर्माण कराया गया है तथा 3 अतिरिक्त पुलों का निर्माण कार्य जारी है।
गंडक नदी पर 4 नए पुल बनाए गए हैं तथा 3 नए पुलों का निर्माण कार्य जारी है। सोन नदी पर 4 नए पुल बनाए गए हैं तथा 2 नए पुलों का निर्माण कार्य जारी है। इस तरह से राज्य में अलग-अलग नदियों पर फिलहाल 18 नए पुलों का निर्माण कराया जा रहा है, जिसे जल्द ही पूरा कर लिया जाएगा। इसके अलावा राज्य की छोटी नदियों और नहरों पर पुल-पुलियों के निर्माण के लिए वर्ष 2007-08 में मुख्यमंत्री सेतु निर्माण योजना की शुरुआत की गई। इसके तहत अब तक 6 हजार से अधिक पुल-पुलियों का निर्माण कराया जा चुका है। इस योजना के तहत 2024 के बाद 649 नए पुल के निर्माण की स्वीकृत दी गई है। कई पुराने पुलों को 4 लेन से 6 लेन पुल में परिवर्तित किया जा रहा है। अब राज्य में रेल ओवरब्रिज की संख्या 11 से बढ़कर 87 हो गई है और 40 से अधिक नए रेल ओवरब्रिज बनाए जा रहे हैं। राज्य में यातायात को सुगम बनाने के लिए कई बाईपास पथों का निर्माण कराया जा रहा है। साथ ही टोलों एवं बसावटों को संपर्कता प्रदान करने के लिए राज्य निधि से मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना लागू की गई है जिसके तहत 1,18,005 किलोमीटर लंबाई की सड़कों का निर्माण करा दिया गया है। बाकी बचे टोलों एवं बसावटों को जल्द से जल्द पक्की सड़क से जोड़ दिया जाएगा। हमलोगों ने कई पथों एवं पुल-पुलियों का निर्माण कराकर वर्ष 2016 में राज्य के सुदूर क्षेत्रों से 6 घंटे में पटना पहुंचने के लक्ष्य को पूरा किया। इस लक्ष्य को पूरा कर 2018 में 5 घंटे में राज्य के किसी भी कोने से पटना पहुंचने का नया लक्ष्य निर्धारित किया गया। अब इसे भी पूरा कर लिया गया है तथा इसे और घटाने के लिए नए एक्सप्रेस-वे, नए पुल, बाईपास, एलिवेटेड रोड एवं आरओबी के निर्माण पर तेजी के काम किया जा रहा है। हमारी सरकार ने जो आपके लिए काम किए हैं, उसे याद रखिए। आगे भी हमलोग ही काम करेंगे। हमलोग जो कहते हैं, उसे पूरा करते हैं। (1/2)
क्या बिहार के नए चाणक्य बनेंगे प्रशांत किशोर?
प्रशांत किशोर, जिन्होंने कभी पीएम मोदी और सीएम नीतीश दोनों के लिए रणनीति बनाई थी, अब उसी राजनीति में अपने पैतरे आजमा रहे हैं। इस बार वे नीतीश के ही फॉर्मूले से उन्हें घेरने की कोशिश में हैं। पीके का फोकस उन शिक्षित, जागरूक और प्रभावशाली वोटरों पर है, जिन्होंने 2005 में बिहार में एनडीए सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई थी — यानी गैर-यादव ओबीसी, मध्यवर्गीय तबका और युवा मतदाता, जो अब बदलाव की तलाश में हैं।
जन सुराज को 6% वोट की तलाश, नीतीश की रणनीति फिर सुर्खियों में
अगर जन सुराज पार्टी को करीब 6% वोट मिलते हैं, तो इसका सबसे बड़ा असर एनडीए पर पड़ सकता है — खासकर भाजपा के शहरी और युवा वोट बैंक पर। भागलपुर, मुजफ्फरपुर और दरभंगा जैसी सीटों पर जन सुराज का असर भाजपा से सीटें खींचकर महागठबंधन को अप्रत्यक्ष फायदा पहुंचा सकता है।
इधर नीतीश कुमार हर संभावित सियासी परिदृश्य के लिए तैयार दिख रहे हैं। जदयू की रणनीति एक ‘मौन समझौते’ की ओर इशारा करती है, जिसमें वे किसी भी सूरत में सत्ता में बने रहने की जमीन तलाश रहे हैं। अगर भाजपा की सीटें 60 से नीचे रहीं और जदयू 40 के आसपास टिकी रही, तो पीके का असर साफ नजर आएगा।
नीतीश सत्ता-विरोधी लहर को अपने पक्ष में मोड़ने पर ध्यान दे रहे हैं। भाजपा अगर समर्थन से पीछे हटे, तो वे एनडीए से अलग होकर दिल्ली पर ठीकरा फोड़ सकते हैं और स्थिरता के नाम पर जनता की सहानुभूति बटोर सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि पीके भी इस समय राजद और तेजस्वी पर ज्यादा हमलावर हैं, जिससे संकेत मिलता है कि नीतीश और पीके की रणनीतिक दिलचस्पियां फिलहाल एक-दूसरे से टकरा नहीं रहीं।
दरअसल, नीतीश को केवल ‘पलटू राम’ कह देना सियासी समझ की भूल है। उन्होंने खुद को इस तरह स्थापित किया है कि बिहार की राजनीति की बागडोर न पूरी तरह लालू के पास जाए, न मोदी के पास। वे किंग भी हैं और किंगमेकर भी — और यही उन्हें बनाता है बिहार का असली चाणक्य 2.0।






