‘सितारे ज़मीन पर’ फ़िल्म के लिए आमिर ख़ान ने बहुत कुछ दांव पर लगाया


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चार वर्षों के लंबे सन्नाटे के बाद आमिर ख़ान इस शुक्रवार को बड़े पर्दे पर वापसी कर रहे हैं. उनकी नई फ़िल्म ‘सितारे ज़मीन पर’ को उनकी ‘कमबैक’ फ़िल्म कहा जा रहा है.

हालांकि, मुंबई फ़िल्म इंडस्ट्री के गलियारों में ये सवाल ख़ूब चर्चा में है कि क्या 60 साल के आमिर वैसा ब्लॉकबस्टर कमबैक कर पाएंगे, जैसा दो साल पहले शाहरुख़ ख़ान ने ‘पठान’ (2023) के ज़रिए किया था?

इस तुलना के पीछे ठोस वजह भी है. आमिर की ही तरह बॉलीवुड के सुपरस्टार शाहरुख़ ख़ान का स्टारडम कुछ साल पहले बुरी तरह हिल गया था.

‘फैन’ (2016), ‘जब हैरी मेट सेजल’ (2017) और ‘ज़ीरो’ (2018) जैसी उनकी बड़ी फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस पर बुरी तरह धराशायी हो गई थीं.

इसके बाद आईं दो बड़ी फिल्में- ‘ठग्स ऑफ हिंदुस्तान’ (2018) और ‘लाल सिंह चड्ढा’ (2022) बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरीं और आमिर के स्टारडम पर सवाल भी खड़े कर दिए.

ख़ास तौर पर ‘लाल सिंह चड्ढा’, जिसका उन्होंने प्रोडक्शन भी किया था, उसकी विफलता ने आमिर को न सिर्फ़ व्यावसायिक रूप से बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी झकझोर कर रख दिया.

हाल में अपने कई इंटरव्यू में कह चुके हैं कि इस नाकामी के बाद वह डिप्रेशन से गुज़रे और उन्होंने फिल्में छोड़ने के बारे में भी सोच लिया था.

आमिर पहले भी ऐसे दौर झेल चुके हैं

आमिर ख़ान ने बतौर हीरो 1988 की बड़ी हिट ‘क़यामत से क़यामत तक’ से बॉलीवुड में धमाकेदार दस्तक दी थी.

वो फ़िल्मी परिवार से ताल्लुक रखते हैं.

उनके पिता ताहिर हुसैन फ़िल्म निर्माता थे और चाचा नासिर हुसैन तो कामयाब स्क्रीनराइटर-निर्माता और निर्देशक थे.

मगर ‘क़यामत से क़यामत तक’ से रातोंरात स्टार बने आमिर की अगली कई फिल्में लव लव लव, अव्वल नंबर, तुम मेरे हो, दीवाना मुझ सा नहीं, जवानी ज़िंदाबाद बुरी तरह फ्लॉप हो गई थीं.

इसके बाद उन्होंने ब्लॉकबस्टर फ़िल्म ‘दिल’ से वापसी की थी. आने वाले सालों में वो हिट और फ्लॉप के सफ़र से गुज़रते हुए राजा हिंदुस्तानी, रंगीला, ग़ुलाम और सरफ़रोश जैसी कामयाब फ़िल्मों के ज़रिए एक प्रमुख स्टार बने रहे.

लगान के बाद बदली रणनीति, ट्रेंडसेटर बने आमिर

2001 में ‘लगान’ और ‘दिल चाहता है’ की सफलता के बाद आमिर ख़ान ने बॉलीवुड में एक बिल्कुल अलग राह चुनी.

जहाँ उनके समकालीन स्टार शाहरुख़, सलमान, अक्षय और गोविंदा साल में कई फ़िल्में साइन कर रहे थे, आमिर ने तय किया कि वो एक वक़्त में सिर्फ़ एक फ़िल्म पर ध्यान देंगे.

इस रणनीति पर उस समय फ़िल्म इंडस्ट्री में खूब सवाल उठे लेकिन आमिर अपने फ़ैसले पर अडिग रहे.

अगले चार साल उन्होंने केतन मेहता की फ़िल्म ‘मंगल पांडे द राइज़िंग’ पर अपना सब कुछ झोंक दिया. मगर 2005 में रिलीज़ हुई मंगल पांडे फ्लॉप हो गई. इस नाकामी ने आमिर ख़ान को बड़ा झटका दिया था. आलोचकों ने कहा कि आमिर को ‘राजा हिंदुस्तानी’ या ‘इश्क़’ जैसी ‘मसाला फिल्में’ ही करनी चाहिए.

आमिर की अगली फ़िल्म ‘रंग दे बसंती’ भी आम बॉलीवुड मसाला फिल्मों से अलग अंदाज़ की थी. ये प्रयोग कामयाब रहा. फ़िल्म बड़ी हिट हो गई. इसके बाद तो आमिर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

फ़ना, ग़जनी, धूम 3 जैसी बड़ी हिट्स आईं, तो तारे ज़मीन पर, पीपली लाइव और डेल्ही बेली जैसी प्रयोगधर्मी फ़िल्में भी. इन सब फ़िल्मों में एक ही समानता थी कि ये सब फ़िल्में हिट थीं.

हर बार आमिर की ख़ासियत रही अलग कहानी, दमदार स्क्रिप्ट और जोख़िम लेने की हिम्मत. फिर आई करियर की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्में: थ्री इडियट्स, पीके, और दंगल. इनसे आमिर की पहचान एक अपराजेय बॉक्स ऑफिस स्टार और ‘मिस्टर परफेक्शनिस्ट’ के रूप में मज़बूत हुई.

कमाई में भी आमिर ने बेंचमार्क सेट किए

बॉलीवुड में आज ‘100 करोड़ क्लब’ को किसी भी कामयाब फ़िल्म की कसौटी माना जाता है. आमिर की फ़िल्म ग़जनी (2008) भारत में पहली 100 करोड़ कमाने वाली फ़िल्म थी, फिर थ्री इडियट्स (2009) पहली फ़िल्म बनी, जिसने 200 करोड़ की कमाई की और पीके (2014) 300 करोड़ क्लब की शुरुआत बनी.

इन सफलताओं के पीछे एक और चीज़ थी. आमिर की फ़िल्म प्रोमोशन और मार्केटिंग में महारत.

वो न सिर्फ़ स्क्रिप्ट चुनने में माहिर हैं बल्कि हर फ़िल्म को बेचने का तरीक़ा भी उन्हें बख़ूबी आता है.

फ़िल्म ग़जनी में उन्होंने न सिर्फ़ ‘बेयर हेड’ लुक अपनाया बल्कि कई शहरों में फ़िल्म प्रचार के लिए दर्शकों के बाल भी ख़ुद काटे, जिससे उस समय फ़िल्म को लेकर एक जबरदस्त माहौल भी बना और फिर ‘थ्री इडियट्स’ के लिए वे आम छात्र की तरह कॉलेज कैंपस में घूमे. वहीं ‘पीके’ के प्रमोशन में रेडियो जॉकी बन गए.

आमिर का मानना है कि फ़िल्म सिर्फ़ बनाई नहीं जाती, उसे महसूस भी कराया जाता है. मगर ये सब एक दशक पहले तक ही काम आया.

पिछले कुछ सालों में हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में काफ़ी कुछ बदल चुका है. इन वर्षों में गिनी-चुनी हिंदी फिल्में ही बड़ी हिट हो पाई हैं.

शाहरुख़, सलमान और आमिर को दशकों तक बॉलीवुड के सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिना गया. लेकिन समय का पहिया घूम चुका है. शाहरुख़ ने तो पठान और जवान के ज़रिए वापसी कर ली जबकि सलमान की पिछली तीन फ़िल्में उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकीं और आमिर को नौ साल से सफलता की तलाश है.

ख़ासतौर पर “परफेक्शन” और “क्वालिटी सिनेमा” से जोड़ कर देखी जाने वाली उनकी छवि डगमगाती दिखी.

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