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सऊदी अरब, जिसे इस्लाम का पवित्र देश माना जाता है, लंबे समय से शराब पीने और बेचने पर कड़े प्रतिबंध रखता आया है। लेकिन क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) के नेतृत्व में देश तेजी से आधुनिकता और आर्थिक सुधारों की ओर बढ़ रहा है। उनके विजन–2030 प्लान के तहत पर्यटन बढ़ाने, विदेशी निवेश आकर्षित करने और देश की अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालने की कोशिश हो रही है। इसी बदलाव के तहत अब शराब से जुड़े नियमों में भी धीरे-धीरे ढील देने की तैयारी की जा रही है।

सऊदी अरब, जिसे लंबे समय से सख्त इस्लामी कानूनों के लिए जाना जाता है, अब सामाजिक और आर्थिक सुधारों के नए चरण में प्रवेश कर रहा है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) के नेतृत्व में देश अपने ‘विजन 2030’ कार्यक्रम के तहत शराब से जुड़े पुराने प्रतिबंधों में धीरे-धीरे ढील देने की दिशा में बढ़ रहा है। इसी बदलाव के हिस्से के रूप में सरकार अब नए शराब स्टोर खोलने की योजना बना रही है, जो खासतौर पर गैर-मुस्लिम विदेशी कर्मचारियों और राजनयिकों के लिए होंगे।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पूर्वी प्रांत धाहरान में अरामको के कंपाउंड में विदेशी कर्मचारियों के लिए एक नया शराब स्टोर खोला जाएगा। वहीं जेद्दा में भी एक स्टोर बनाया जा रहा है, जहां कई अंतरराष्ट्रीय कॉन्सुलेट्स मौजूद हैं। इससे पहले रियाद में 73 साल बाद पहला शराब स्टोर गैर-मुस्लिम डिप्लोमैट्स के लिए खोला जा चुका है, जो देश में हो रहे बड़े सामाजिक बदलावों का संकेत है।
हालांकि इस्लाम में शराब हराम मानी जाती है, लेकिन सऊदी सरकार यह छूट केवल विदेशी राजनयिकों और गैर-मुस्लिम निवासियों तक सीमित रखे हुए है। आम जनता के लिए शराब पर प्रतिबंध अभी भी लागू है। अरामको और सऊदी सरकार ने नए स्टोर्स पर आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन यह कदम देश को वैश्विक पर्यटन और निवेश के लिए अधिक आकर्षक बनाने के उद्देश्य से उठाया जा रहा है।
MBS पहले ही सऊदी में सिनेमा, कॉन्सर्ट, खेल आयोजन और सांस्कृतिक गतिविधियों की अनुमति देकर समाज में कई बड़े बदलाव ला चुके हैं। अब शराब नीति में ढील को भी उसी सुधार यात्रा का हिस्सा माना जा रहा है। सऊदी अरब 2034 फुटबॉल विश्व कप की मेजबानी की तैयारी कर रहा है, जिसके चलते देश में विदेशी पर्यटकों और डेलिगेट्स की बड़ी संख्या आने की उम्मीद है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप सुविधाएँ उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि देश के रूढ़िवादी और दक्षिणपंथी समूह इन बदलावों की लगातार आलोचना कर रहे हैं।






