बांग्लादेश ‘चिकन नेक’ के पास चीनी एयर-डिफेंस रडार तैनात करेगा — पार्ट्स पहुँचे, यूनुस पर पाक समर्थन के आरोप उठे


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एयर डिफेंस सिस्टम के रडार तैनाती का मकसद एक व्यापक निगरानी नेटवर्क बनाकर दुश्मन गतिविधियों का समय रहते पता लगाना और लक्ष्यों की सटीक पहचान कर फायर कंट्रोल को निर्देश देना होता है। एक सैन्य-स्तरीय रडार सिस्टम में मुख्य रूप से ट्रांसमीटर, रिसीवर और एंटेना होते हैं जो सिग्नल भेजते और प्राप्त कर के वस्तुओं का पता लगाते हैं; साथ ही इनपुट को प्रोसेस करने वाला हाई-स्पीड प्रोसेसर होता है जो ट्रैकों को बनाता और अपडेट रखता है। इससे जुड़े अन्य अनिवार्य घटकों में कमांड-एंड-कंट्रोल केंद्र (जहाँ से निर्णय लिए और हथियार निर्देशित किए जाते हैं), ट्रैकिंग और आईडेंटिफिकेशन सॉफ्टवेयर, तथा आवश्यकतानुसार हथियार सिस्टम या लांचर्स शामिल होते हैं। कुल मिलाकर ये सारे घटक मिलकर वायुमंडलीय खतरे से निपटने के लिए एक समन्वित और त्वरित रक्षा तंत्र तैयार करते हैं।

बांग्लादेश द्वारा भारत की सीमा के बेहद करीब लालमोनिरहाट एयरबेस पर नई सैन्य तैयारियां किए जाने से दक्षिण एशिया में सामरिक तनाव की नई लहर उठने लगी है। रिपोर्टों के मुताबिक, बांग्लादेश वायुसेना (BAF) इस एयरबेस को एक अत्याधुनिक मिलिट्री हब के रूप में विकसित करने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। यहां लड़ाकू विमानों के लिए आधुनिक हैंगर के साथ-साथ उन्नत एयर डिफेंस रडार सिस्टम की स्थापना की जा रही है, जिसे चीन की तकनीकी मदद से तैयार किया जा रहा है। यह पूरा प्रोजेक्ट भारत के “चिकेन नेक” यानी सिलिगुड़ी कॉरिडोर के बेहद नजदीक है — वह संकीर्ण भू-भाग जो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। यही कारण है कि यह गतिविधि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गई है।

जानकारी के अनुसार, करीब दो हफ्ते पहले चीन से आए रडार सिस्टम के कई हिस्से लालमोनिरहाट एयरबेस पर पहुंचाए गए थे। यह रडार सिस्टम पुराने ढांचे की जगह एक नई और कहीं अधिक शक्तिशाली निगरानी व्यवस्था का हिस्सा होगा। सूत्रों का कहना है कि एयरबेस के भीतर एक नया कंक्रीट प्लेटफॉर्म, वायरलेस रूम और कई नई इमारतें बनाई जा रही हैं। पिछले छह महीनों में यहां कई आवासीय परिसर और तकनीकी इन्फ्रास्ट्रक्चर का काम भी पूरा किया जा चुका है।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि एयर डिफेंस रडार सिस्टम किसी भी देश की निगरानी और रक्षा रणनीति का सबसे अहम हिस्सा होते हैं। ये रडार न केवल हवाई खतरों का पता लगाने और उनका पीछा करने में सक्षम होते हैं, बल्कि दुश्मन की मिसाइलों और विमानों की गति और दिशा का सटीक अनुमान भी लगा सकते हैं। ऐसे में भारत की सीमा से कुछ ही दूरी पर इस तरह के उपकरणों की तैनाती स्वाभाविक रूप से एक बड़ी सामरिक चुनौती मानी जा रही है।

बांग्लादेश के इस कदम के पीछे चीन की भूमिका को लेकर कई रिपोर्ट्स सामने आई हैं। मई 2025 में बांग्लादेशी सेना के वरिष्ठ अधिकारियों और चीनी रक्षा कंपनी China Vanguard Company Limited के प्रतिनिधियों के बीच हुई एक बैठक में HQ-17AE सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों (SAMs), JSG-400 TDR रडार सिस्टम और FK-3 मध्यम दूरी की मिसाइलों की खरीद पर चर्चा की गई थी। JSG-400 एक उन्नत फायर कंट्रोल रडार है, जो चीन के HQ-9BE मिसाइल डिफेंस सिस्टम का हिस्सा है। यह सिस्टम बैलिस्टिक मिसाइलों और लड़ाकू विमानों दोनों के खिलाफ बेहद प्रभावी माना जाता है।

रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि बांग्लादेश ने हाल ही में बोगुरा में GM 403-M लंबी दूरी के एयर सर्विलांस रडार को भी सक्रिय किया है। यह वही सिस्टम है जिसे फ्रांस की ThalesRaytheon Systems (TRS) ने विकसित किया है। इससे पहले, अप्रैल 2025 में ढाका के मीरपुर स्थित 71वें स्क्वाड्रन में भी एक GM 403-M रडार स्थापित किया गया था। इन दोनों रडारों के सक्रिय होने के बाद अब लालमोनिरहाट एयरबेस पर तीसरे रडार सिस्टम की स्थापना से एक मजबूत निगरानी नेटवर्क बनने जा रहा है, जो पूरे उत्तर बंगाल और भारतीय सीमा क्षेत्रों को कवर कर सकता है।

भारत की सैन्य खुफिया एजेंसियों ने अक्टूबर में लालमोनिरहाट और ठाकुरगांव एयरबेस का निरीक्षण भी किया था। यह टीम तीन वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक मेजर जनरल के नेतृत्व में वहां पहुंची थी। हालांकि, निरीक्षण के बाद कुछ दिनों के लिए निर्माण कार्य रोक दिया गया था, लेकिन बाद में यह काम फिर से शुरू हो गया। अब यहां 10 से 12 लड़ाकू विमानों के लिए पार्किंग स्पेस तैयार किया जा रहा है।

सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही बांग्लादेश सीधे तौर पर भारत के लिए कोई खतरा नहीं है, लेकिन चीन की बढ़ती सैन्य उपस्थिति इसे भारत के खिलाफ एक संभावित “स्ट्रैटेजिक टूल” में बदल सकती है। चीन पहले ही पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत की सीमाओं पर दोतरफा दबाव की रणनीति अपनाता रहा है। ऐसे में अगर ढाका भी बीजिंग की सैन्य नीतियों के प्रभाव में आता है, तो यह भारत की पूर्वी सीमाओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।

भारत फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अब भारत को न केवल अपनी निगरानी क्षमताओं को और मजबूत करने की जरूरत है, बल्कि बांग्लादेश के साथ सामरिक संवाद बढ़ाकर उसे चीन की कूटनीतिक पकड़ से बाहर निकालना भी जरूरी है। क्योंकि अगर बांग्लादेश की धरती पर चीन के सैन्य उपकरणों और रडारों की मौजूदगी स्थायी हो गई, तो यह न केवल उत्तर-पूर्व भारत के लिए बल्कि पूरे उपमहाद्वीप की सुरक्षा संतुलन के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

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