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देश के सबसे बड़े कारोबारी समूह टाटा ग्रुप में हाल ही में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। रतन टाटा के निधन के लगभग एक साल बाद, उनके बेहद करीबी माने जाने वाले मेहली मिस्त्री को टाटा ट्रस्ट्स से बाहर कर दिया गया है। यह फैसला उद्योग जगत में चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि टाटा ट्रस्ट्स ही टाटा ग्रुप की मूल होल्डिंग कंपनी टाटा संस में बहुमत हिस्सेदारी रखता है। बताया जा रहा है कि मेहली मिस्त्री को हटाए जाने के पीछे आंतरिक मतभेद और संगठनात्मक पुनर्गठन की प्रक्रिया जिम्मेदार है। इस घटनाक्रम के बाद अब सवाल उठ रहे हैं कि रतन टाटा के बाद समूह में असली शक्ति किसके हाथ में होगी।
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रतन टाटा के निधन के एक साल बाद टाटा समूह में एक बार फिर बड़ा बदलाव सामने आया है। इस बार चर्चा में हैं उनके सबसे करीबी माने जाने वाले मेहली मिस्त्री, जिन्हें टाटा ट्रस्ट्स से बाहर कर दिया गया है। मेहली मिस्त्री न केवल रतन टाटा के विश्वसनीय सहयोगी थे, बल्कि उनकी वसीयत के निष्पादक (Executor) भी रहे हैं। उन्हें लंबे समय से टाटा विरासत के संरक्षक के रूप में देखा जाता था, लेकिन अब उन्हें आजीवन ट्रस्टी के तौर पर दोबारा नियुक्त नहीं किया गया। बताया जा रहा है कि टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा, वाइस चेयरमैन वेणु श्रीनिवासन और ट्रस्टी विजय सिंह ने मिस्त्री की पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया, जबकि तीन अन्य ट्रस्टी इसके पक्ष में थे।
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यह फैसला इसलिए भी खास है क्योंकि टाटा ट्रस्ट्स में आमतौर पर सभी बड़े निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। हालांकि, इस बार मतभेद साफ दिखे। दोनों प्रमुख ट्रस्ट — सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) — में वोटिंग प्रक्रिया और नियम अलग हैं, और इन्हीं नियमों के चलते मिस्त्री को दोबारा ट्रस्टी नहीं बनाया गया। सूत्रों के अनुसार, मिस्त्री का कार्यकाल 22 अक्टूबर को समाप्त हुआ और उन्हें पुनर्नियुक्त करने का प्रस्ताव 3-2 के वोट से खारिज हो गया।
इस फैसले के बाद टाटा ट्रस्ट्स के भीतर शक्ति संतुलन और नेतृत्व की दिशा को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं। मेहली मिस्त्री ने पहले कहा था कि ट्रस्टी के कार्यकाल का विस्तार केवल औपचारिक प्रक्रिया होती है, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल गए हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मिस्त्री कोर्ट का रुख करते हैं, तो यह विवाद टाटा बनाम मिस्त्री परिवार की एक नई जंग का रूप ले सकता है — जो पहले से ही समूह के इतिहास में एक संवेदनशील अध्याय रहा है। यह घटनाक्रम इस बात की ओर भी इशारा करता है कि रतन टाटा के जाने के बाद समूह में शक्ति का समीकरण लगातार बदल रहा है और आने वाले समय में इसका असर टाटा ट्रस्ट्स की नीतियों और दिशा पर साफ दिखाई दे सकता है।






