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हाजीपुर विधानसभा सीट, जो वैशाली जिले में स्थित है, का राजनीतिक मिजाज उसकी लोकसभा सीट से काफी अलग है। जहाँ हाजीपुर लोकसभा सीट रामविलास पासवान परिवार का मजबूत गढ़ और अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित मानी जाती है, वहीं विधानसभा सीट पर लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का प्रभाव कायम है।
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हाजीपुर विधानसभा सीट, जो वैशाली जिले में स्थित है और पटना से महात्मा गांधी सेतु के जरिए जुड़ी हुई है, बिहार की राजनीति में एक अहम जगह रखती है। इस सीट का मिजाज उसकी लोकसभा सीट से बिल्कुल अलग है। हाजीपुर लोकसभा सीट जहाँ दिवंगत रामविलास पासवान और उनके परिवार का मजबूत गढ़ मानी जाती है और अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है, वहीं हाजीपुर विधानसभा सीट सामान्य श्रेणी की है और यहां लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का दबदबा कायम है। इस बार भी बीजेपी ने अपने मौजूदा विधायक अवधेश सिंह पर भरोसा जताते हुए उन्हें टिकट दिया है, जबकि आरजेडी ने पिछली बार के उम्मीदवार देव कुमार चौरसिया को दोबारा मैदान में उतारा है।
हाजीपुर की पहचान केवल राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से भी खास है। इसे बिहार के सबसे बड़े केले के थोक बाजारों में से एक माना जाता है। यहां के हर खेत और गली में केले के पेड़ नजर आते हैं, जो इस क्षेत्र की पहचान बन चुके हैं। यही वजह है कि शहर के चौक पर हाल ही में केले का प्रतीकात्मक स्टैच्यू भी लगाया गया है।
लेकिन चुनावी माहौल में जब मतदाताओं से बात की जाती है, तो सबसे बड़ी शिकायतें रोजगार, सड़कों की स्थिति और जलजमाव जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी को लेकर सामने आती हैं। स्थानीय निवासी गणेश कुमार बताते हैं कि टूटी सड़कों और जलभराव की समस्या वर्षों से जस की तस है। लोगों का कहना है कि अगर कोई दल लगातार जीतता है तो जवाबदेही कम हो जाती है, इसलिए अब बदलाव जरूरी है। वहीं, संजय कुमार जैसे युवाओं का कहना है कि पढ़ाई-लिखाई के बावजूद रोजगार के अवसर न मिलना सबसे बड़ी समस्या है, जिससे पलायन रुक ही नहीं पा रहा।
हालांकि कुछ लोग मोदी सरकार के काम की तारीफ भी करते हैं। उदय कुमार दास जैसे मतदाता कहते हैं कि केंद्र सरकार ने कई अच्छे काम किए हैं, लेकिन राज्य और स्थानीय स्तर पर काम की रफ्तार धीमी है। वहीं, महिलाओं को दस हजार रुपये देने की घोषणा को लेकर अलग-अलग राय हैं — कुछ इसे रोजगार के लिए मदद मानती हैं तो कुछ इसे अल्पकालिक राहत बताती हैं।
हाजीपुर विधानसभा में करीब 65 फीसदी आबादी ग्रामीण है, जबकि वैशाली जिले का मुख्यालय भी इसी सीट में आता है। यहां बीजेपी का प्रभाव 2000 से लगातार देखा गया है। नित्यानंद राय ने इस सीट से कई बार जीत हासिल की और उनके लोकसभा जाने के बाद उनके करीबी अवधेश सिंह ने उपचुनाव और बाद के दोनों विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज की।
वैशाली को “लोकतंत्र की जननी” कहा जाता है क्योंकि प्राचीन काल में यही वह भूमि थी, जहां लिच्छवी गणराज्य जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था विकसित हुई थी। उस समय कुलीनों की सभा मिलकर शासन और नीतियों पर निर्णय लेती थी — जो आधुनिक लोकतंत्र की नींव मानी जाती है। आज, उसी लोकतांत्रिक भूमि पर एक बार फिर जनता अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांग रही है — इस बार जाति या पार्टी नहीं, बल्कि काम और विकास ही चुनावी कसौटी बनते दिख रहे हैं।






