सोने का मुकुट पहनकर हमला करते थे अनंत सिंह:लालू का घोड़ा खरीदकर बग्‍घी से विधानसभा पहुंचे; रेप का आरोप लगाने वाली महिला की लाश मिली


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दैनिक भास्‍कर की इलेक्‍शन सीरीज ‘गैंगस्‍टर’ के तीसरे एपिसोड में कहानी बाहुबली नेता अनंत सिंह की…

साल 1990 का वक्‍त। पटना में तैनात डिस्ट्रिक्ट जज किसी काम से पटना जिले के बाढ़ कस्बे के पास नदवां गांव जा रहे थे। बाढ़ रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतरे, जहां पहले से ही सरकारी गाड़ी उनका इंतजार कर रही थी। जज साहब गाड़ी में बैठ गए और नदवां की ओर चल पड़े।

गाड़ी नदवां पहुंचने ही वाली थी कि ड्राइवर ने कहा, ‘जज साहब, गाड़ी का शीशा नीचे कर लीजिए…आगे चेकिंग होगा।’

जज साहब सोच में पड़ गए और बोले, ‘डिस्ट्रिक्ट जज की तलाशी कौन ले सकता है।’ ड्राइवर ने कहा, ‘नदवां अनंत सिंह का गांव है सरजी। मुहाने पर हथियारों से लैस उसके लोग 24 घंटा बैठे रहते हैं। अनंत सिंह की सिक्‍योरिटी खातिर हर आने-जाने वाले की चेकिंग करते हैं।’

जज साहब को यकीन ही नहीं हुआ। गाड़ी जब नदवां पहुंची तो उन्‍होंने देखा, लकड़ी के बड़े से लट्ठे से फाटक बनाया गया था। 12-13 आदमी बंदूकें लिए वहां खड़े हुए थे और सभी गाड़ियों की तलाशी ले रहे थे। जज साहब ने चुपचाप अपनी गाड़ी की तलाशी दी और नदवां में दाखिल हुए।

साधु बनने के लिए 9 साल की उम्र में घर छोड़ा

5 जनवरी 1967, बिहार का पटना जिला। बाढ़ कस्बे के पास नदवां गांव में चंद्रदीप सिंह के घर अनंत सिंह का जन्म हुआ। चार भाइयों में वो सबसे छोटा था। उनका मन पढ़ाई-लिखाई में कतई नहीं लगता था। इसलिए चौथी क्लास के बाद पढ़ाई छोड़ दी। मन पूजा-पाठ, धर्म और आध्यात्मिकता में ज्यादा लगता था, सो 9 साल की उम्र में घर छोड़ दिया।

वो हरिद्वार जाकर साधुओं के बीच रहने लगे। साधुओं की सेवा करना और दिनभर पूजा-पाठ में लीन रहना, उनका बस यही काम था।

एक दिन कुछ साधु आपस में झगड़ा करने लगे। नौबत मारपीट तक पहुंच गई। अनंत ये देखकर दंग रह गए और वैराग्य की जिंदगी से उनका मोह भंग हो गया। इसके बाद वो अपने गांव लौट गए।

भाई की हत्‍या हुई तो कहा- खुद इंसाफ करूंगा

गर्मी की एक दोपहर वो अपने घर में बैठकर खाना खा रहे थे। तभी एक नौकर हांफता हुआ उनके पास पहुंचा और बोला, ‘सरकार, बिराची सिंह जी मार दिए गए हैं….।’

अनंत के बड़े भाई बिराची सिंह को किसी ने गांव के चौक पर ही गोली मार दी थी। अनंत फौरन ही भाई को देखने दौड़ गए। वहां पहुंचते ही बोले, ‘ये जिसका भी काम है, उसे मैं छोड़ूंगा नहीं…’

अनंत सिंह का परिवार इलाके के बड़े जमींदारों में आता था। उस वक्त बिहार में माओवादी संगठनों का आतंक था। आए दिन उनका संघर्ष जमींदारों के साथ होता।

घटना के बाद अनंत सिंह ने पूरे गांव में पूछताछ की। हर घर में जाकर पूछा। पता चला माओवादी संगठन के सरगना ने बिराची सिंह की हत्या की है। किसी ने बताया, ‘वो ढूंढकर बड़े जमींदारों की हत्या करता है। कहता है कि सदियों पुराना हिसाब कर रहा है…।’

राजेश सिंह अपनी किताब बाहुबलीज ऑफ इंडियन पॉलिटिक्‍स में लिखते हैं, कि अनंत आग-बबूला हो गए। उनके सिर पर धुन सवार हो गई कि भाई के हत्यारे को ठिकाने लगाना है, लेकिन परिवार ने समझाया, ‘पुलिस हमारा न्याय करेगी, तुम चिंता मत करो…।’

महीनों बीत गए, लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया। फिर अनंत ने फैसला किया कि अब वो खुद ही इंसाफ करेंगे।

एक दिन उनके मुखबिर ने आकर बताया, ‘सरकार, आपके गांव के पास से जो गंगा बहती है, उसी के पार डेरा डाला है वो… बहन को ससुराल छोड़ कर लौटा है। सुने हैं, संगी-साथी भी कम ही हैं।’

अनंत फौरन नदी किनारे पहुंचे। एक साथी ने कहा, ‘सरकार अभी कोई हथियार वगैरह तो है नहीं। नदी पार करना भी मुश्‍किल लग रहा है। किसी और दिन हिसाब कीजिएगा…।’ वो बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि अनंत ने नदी में छलांग लगा दी।

वो तैरकर ही नदी पार करने लगे। साथी घबराकर वहीं रुक गए। पानी में घंटों हाथ-पैर मारने के बाद अनंत आखिरकार नदी के दूसरी ओर पहुंचे। घने जंगल के बीच वो अपने भाई के हत्यारे को ढूंढने लगे। वो नदी पार कर थक चुके थे, लेकिन बदले की धुन सवार थी।

आखिरकार उनका सामना अपने भाई के हत्यारे से हुआ। कोई हथियार नहीं था तो पत्‍थर हाथ में उठा लिया। उन्‍होंने पत्‍थर सिर पर मारकर पहले अपने दुश्‍मन को बेहोश कर दिया और फिर एक बड़े पत्‍थर से उसका सिर कुचल डाला। वो खून से सने हाथ लिए नदी पार कर वापस नदवां लौट गए।

इस घटना के बारे में एक इंटरव्‍यू में अनंत सिंह ने कहा था, ‘इंसाफ होना जरूरी था।’

बिहार के पत्रकार ज्ञानेश्‍वर बताते हैं कि इस घटना के बाद गांव और आस-पास के दूसरे जमींदार भी उसके पास सुरक्षा के लिए आने लगे, लेकिन पुलिस-प्रशासन ने कभी उसकी ओर आंख तक नहीं उठाई। वजह थे उनके बड़े भाई दिलीप सिंह।

दिलीप सिंह 1990 से 1995 के बीच जनता दल से मोकामा के विधायक थे। आगे जाकर वो लालू यादव-राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री भी बने। जब भी अनंत सिंह के खिलाफ मुकदमे कोर्ट पहुंचते, तो वहां से भी उन्‍हें आसानी से जमानत मिल जाती।

पड़ोसी ने किया जानलेवा हमला, बहनोई मारे गए

नदवां गांव में विवेका पहलवान और अनंत सिंह पड़ोसी थे, जिनके घर की दीवार एक ही थी। दोनों परिवार की रंजिश बहुत पुरानी थी।

चूंकि गांव में अनंत सिंह का दबदबा ज्यादा रहा, इसलिए विवेका पहलवान ने गांव छोड़ दिया था। बाहर जाकर वो अनंत सिंह के दुश्मनों से मिला और उन्हें इकट्ठा करने लगा। एक बार सभी रात में गांव में घुस आए और अनंत सिंह पर हमला कर दिया। अनंत सतर्क थे, सो उन्‍होंने भी जवाबी हमला किया। दोनों ओर से हजारों राउंड गोलियां चलीं। अनंत के बहनोई भूषण सिंह इस हमले में मारे गए। इसके बाद ये दुश्मनी और खूनी हो गई।

1990 में मोकामा का चुनाव अनंत के बड़े भाई दिलीप सिंह जीत गए। दोनों भाई चाहते थे कि बाढ़ पर भी उन्हीं का कब्जा हो, सो वहां से उन्होंने अपने तीसरे भाई सच्चिदानंद सिंह उर्फ फाजो सिंह को निर्दलीय चुनाव लड़ाया, लेकिन बाढ़ से जीत लालू यादव की पार्टी के विजयकिशन की हुई।

किडनैप व्‍यापारी को छुड़ाने के लिए पूरे गांव पर धावा बोला

इसी दौरान बाढ़ से एक बनिया जाति के एक व्यापारी का अपहरण कर लिया गया। पुलिस इस मामले में कुछ नहीं कर पा रही थी। ऐसे में लोग शिकायत लेकर नदवां गांव अनंत सिंह के पास पहुंचे। अनंत सिंह ने छानबीन कराई तो पता चला कि भावनचक के बच्चू सिंह ने अपहरण किया है।

अनंत अपने दलबल के साथ सीधे बच्चू सिंह के गांव में घुस गए। घंटों गोलीबारी हुई और व्यापारी को छुड़ा लिया गया। बच्‍चू सिंह इस बात से भड़क गया और इलाके में मारकाट शुरू हो गई। इस लड़ाई में सभी राजपूत बच्चू सिंह की तरफ और सभी भूमिहार अनंत सिंह की तरफ हो गए थे।

दोनों ओर से लाशें गिरने लगीं। आखिरकार साल 2000 में एक गैंगवार में बच्‍चू सिंह मारा गया। पुलिस रिपोर्ट में हत्‍या के मुख्‍य आरोपी अनंत सिंह ही थे।

पूरे गांव को बनाया अपना किला

पत्रकार ज्ञानेश्‍वर बताते हैं, अनंत सिंह का सुरक्षा का इंतजाम बेहद मजबूत था। उन्‍होंने पूरे गांव को अपना अभेद्य किला बना रखा था। किला ऐसा जहां पुलिस-प्रशासन के लोग तक बिना इजाजत घुस नहीं सकते थे।

उनके पास 100 से ज्यादा घोड़े और टम-टम थे, जिन्हें उन्‍होंने गांव के जरूरतमंदों को बांट रखा था। ये लोग दिन में टम-टम चलाकर कमाई करते और रात में अनंत सिंह के घर के आसपास सभी टम-टम पार्क कर देते। पास ही घोड़ों को भी बांध देते।

अनंत समय-समय पर गांव के लोगों की मदद भी करते रहते थे। इससे उन्‍होंने लोगों का भरोसा जीत लिया। सालों तक उन्‍होंने गांव के लिए जाने वाली सड़क को पक्की नहीं होने दिया, ताकि कोई गांव तक गाड़ी दौड़ाता हुआ ना आ सके।

एक बार बाढ़ के ASP अनंत सिंह को अरेस्ट करने नदवां गांव पहुंच गए। वो बिना फोर्स के ही गांव में दाखिल हो गए। हमेशा की तरह अनंत तक इसकी खबर पहुंच गई। हवेली तक पहुंचते ही ASP को बंधक बना लिया गया। कई दूसरे अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद ASP को छोड़ा गया।

हिंदी फिल्मों के बैड-मैन वाली छवि बनाई

सफेद रंग के कपड़े, आंखों पर काला चश्मा, माथे पर लंबा तिलक, रौबदार मूछें, जिसे वो समय-समय पर घुमाते रहते और मुंह में दबी सिगरेट- ये अनंत सिंह के सिग्नेचर स्टाइल बन गए। उन्‍होंने अपने घर में एक अजगर और एक हाथ मिलाने वाला हाथी भी पाला हुआ था

वो अक्सर अपने घर पर डांस पार्टियों का आयोजन करने लगे। ऐसी ही एक पार्टी का वीडियो खूब चर्चा में रहा जिसमें अनंत सिंह किसी डांसर के साथ हाथ में AK-47 लेकर झूमते नजर आ रहे थे। हालांकि, इस वीडियो के बारे में मीडिया में जब सवाल पूछा गया तो उन्‍होंने कहा, ‘वीडियो नकली है, मेरे विरोधियों की साजिश है।’

उनकी छवि इलाके में रॉबिनहुड जैसी थी। वो कभी साड़ियां बांटते, तो कभी जरूरतमंदों के लिए भोज का आयोजन करते। रमजान के महीने में इफ्तार करवाते और सावन में भंडारे। भूमिहार जाति का पूरा सपोर्ट उनके पास था। सीनियर जर्नलिस्ट ज्ञानेश्वर के मुताबिक वो जब भी किसी पर हमला करने जाते तो सोने का मुकुट पहनकर जाते। लोग उन्हें छोटे सरकार कहकर बुलाने लगे थे।

नीतीश का साथ मिला और चुनाव जीतते गए

लालू यादव से अलग होने के बाद नीतीश कुमार पर राजनीतिक संकट मंडराता नजर आ रहा था। राजेश सिंह की किताब बाहुबलीज ऑफ इंडियन पॉलिटिक्‍स के अनुसार, 1996 के लोकसभा चुनाव में बाढ़ लोकसभा से गाड़ी पार करना नीतीश कुमार को चुनौती जैसा लग रहा था। ऐसे में उनकी नजर अनंत सिंह पर पड़ी।

अनंत सिंह ने नीतीश से हाथ मिला लिया। अनंत सिंह की ही बदौलत नीतीश कुमार 1996, 1998 और 1999 में लोकसभा चुनाव जीते और अटल सरकार में मंत्री भी रहे।

2004 के लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान बाढ़ में एक जनसभा की गई। इस दौरान अनंत सिंह ने नीतीश कुमार को चांदी के सिक्कों से तौल दिया। इसका एक वीडियो भी उन दिनों कई मीडिया चैनलों ने चलाया।

 

ये अनंत सिंह की राजनीति में औपचारिक एंट्री थी। इसके बाद 2005 में उन्‍होंने जदयू के टिकट पर मोकामा से विधानसभा चुनाव जीता। इसी साल नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और उन्होंने जनता से वादा किया कि वो बिहार को जंगल राज से मुक्ति दिलाएंगे और लॉ एंड ऑर्डर को ठीक करेंगे।

इस दौरान कई बाहुबलियों और अपराधियों को पुलिस ने निशाना बनाया। दर्जनभर से ज्यादा मामले अनंत सिंह के खिलाफ दर्ज हुए, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

घायल अनंत सिंह को गिरफ्तार करने अस्‍पताल पहुंची पुलिस

2 जुलाई 2004, बिहार के सीनियर जर्नलिस्ट ज्ञानेश्‍वर के अनुसार, सवेरे उठकर अनंत सिंह अपने घर की बैठक में शेविंग करवा रहे थे। तभी विवेका पहलवान के घर की खिड़की खुली। किसी को समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ। अचानक खिड़की से Ak-47 से फायरिंग शुरू हो गई। एक गोली अनंत सिंह की छाती में लगी।

जवाब में अनंत सिंह के लोग दौड़कर विवेका पहलवान के घर पहुंचे और दरवाजा तोड़कर अंदर घुसे, लेकिन अंदर उन्हें कोई नहीं मिला। हमला करने वाले सभी लोग घर के पीछे के दरवाजे से अब तक भाग चुके थे।

दूसरी ओर अनंत सिंह का काफी खून बह चुका था। उन्हें तुरंत गाड़ी में बैठाकर पटना ले जाया गया। आलोक नर्सिंग होम की इमरजेंसी में डॉ. नरेंद्र प्रसाद ने इलाज शुरू किया।

डॉ. प्रसाद ने कहा, ‘खून काफी बह चुका है और अनंत सिंह जी की इंजरी भी बहुत क्रिटिकल है। इन्हें बचाना मुश्किल है…।’

अनंत के भाई दिलीप सिंह ने डॉक्टर की कनपट्टी पर पिस्तौल रख दी, बोले ‘ऐसे कैसे बचाना मुश्किल है… अगर हमरे भाई को कुछ हुआ तो तू भी अपने परिवार का मुंह नहीं देख सकेगा डॉक्टर…।’

 

 

 

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