1.06 लाख करोड़ लगाने के बाद भी अडानी का प्लांट संकट में, कच्चे माल की किल्लत से पड़ा बेहाल


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गौतम अडानी के गुजरात स्थित कॉपर स्मेल्टर प्लांट की क्षमता सालाना 5 लाख टन है और कंपनी इसे चार साल में दोगुना करने की तैयारी में है, लेकिन फिलहाल प्लांट को सबसे बड़ी दिक्कत कच्चे माल की सप्लाई को लेकर हो रही है। भारत में कॉपर की मांग लगातार बढ़ रही है, जबकि घरेलू स्तर पर उत्पादन सीमित होने के कारण सप्लाई बेहद टाइट है। कच्चा माल न मिलने से प्लांट की उत्पादन क्षमता पूरी तरह उपयोग नहीं हो पा रही है, जिससे पूरे कॉपर वैल्यू चेन पर असर पड़ रहा है। सरकार की ओर से इंफ्रास्ट्रक्चर, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, रिन्यूएबल एनर्जी और पावर सेक्टर में तेजी से बढ़ती जरूरतों ने कॉपर की मांग को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा दिया है, लेकिन घरेलू आपूर्ति उस गति से बढ़ नहीं पाई है। इसी वजह से अडानी समूह का बड़ा निवेश होने के बावजूद स्मेल्टर प्लांट अपेक्षित स्तर पर काम नहीं कर पा रहा है।

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गुजरात में गौतम अडानी के 1.2 अरब डॉलर के कॉपर स्मेल्टर को पर्याप्त कच्चा माल न मिलने से संचालन कठिनाई में पड़ गया है। जून 2024 में उत्पादन शुरू करने के बाद से कच्छ कॉपर लिमिटेड को अपनी 500,000 टन की सालाना क्षमता के मुकाबले बहुत कम कॉपर कन्सेंट्रेट मिल पा रहा है। कस्टम डेटा के अनुसार, कंपनी को अभी तक उसकी आवश्यकता के मात्र दसवें हिस्से के बराबर ही कच्चा माल उपलब्ध हुआ है। अक्टूबर तक कंपनी ने सिर्फ 1.47 लाख टन कन्सेंट्रेट आयात किया, जबकि हिंडाल्को ने इसी अवधि में 10 लाख टन से अधिक खरीदा। पूरी क्षमता से काम करने के लिए स्मेल्टर को करीब 1.6 मिलियन टन कॉपर कन्सेंट्रेट की जरूरत है।

दुनिया भर में कॉपर सप्लाई गड़बड़ाई हुई है—फ्रीपोर्ट-मैकमोरन, हडबे, इवानहो और चिली की सरकारी कंपनी कोडेलको जैसी खदानों में बाधाएं आई हैं। चीन भी अपनी स्मेल्टिंग क्षमता लगातार बढ़ा रहा है, जिससे ग्लोबल सप्लाई पर दबाव और स्मेल्टरों के मुनाफे में भारी कमी आई है। इसी कारण ट्रीटमेंट और रिफाइनिंग चार्ज रिकॉर्ड निचले स्तर पर हैं, जिससे कच्चा माल हासिल करना महंगा और मुश्किल हो गया है।

अडानी की कच्छ कॉपर अगले चार साल में अपनी क्षमता को दोगुना कर 1 मिलियन टन करने की योजना बना रही है, लेकिन सप्लाई संकट के चलते लागू करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। शुरुआती चरण में प्लांट कम मुनाफे या घाटे में भी चल सकता है। अब तक BHP, ग्लेंकोर और हडबे जैसी कंपनियों से सीमित सप्लाई मिली है। यह स्थिति साफ दिखाती है कि बढ़ती घरेलू मांग के बीच भारत को धातु क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की राह में अभी कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना होगा।

 

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