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जोधपुर और फलोदी जिलों में बेमौसम बारिश ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। लगभग 8 लाख हेक्टेयर में बोई गई बाजरा, मूंग, मोठ और ग्वार की फसलें बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। कटाई के बाद खेतों और खलिहानों में सूखने के लिए रखी फसलें भीगने की वजह से खराब हो गई जिससे बड़े नुकसान की आशंका है।
बारिश के बाद फसलें गली
किसानों ने मूंग की फलियां, बाजरे की सींटियां और मोठ की फसल काटकर सूखने के लिए रखी थीं। फसलों से नमी खत्म होते ही उन्हें निकालने की तैयारी चल रही थी लेकिन अचानक हुई मूसलाधार बारिश ने पूरी योजना पर पानी फेर दिया। खेतों में पानी भरने से फसलें गलने लगी हैं।
इन इलाकों में सबसे ज्यादा नुकसान
क्षेत्र के भोपालगढ़, पीपाड़, बावड़ी, ओसियां, सेखाला, मंडोर, लोहावट, बापिणी, उप तहसील गुड़ा विश्नोइयां और मतोड़ा में फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। बिलाड़ा, तिंवरी और चामू में पहले ही अधिकतर फसलें गलने से खराब हो चुकी थीं। अब बची हुई फसलें भी भीगने और डूबने से बड़े नुकसान की आशंका है।
बाजार में फसलों में कीमत गिरेगी
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार पानी में भीगने से फसलों की गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ेगा। भीगे हुए दाने काले पड़ जाएंगे और अंकुरित होकर खराब हो जाएंगे। फलियों के चटकने से भी फसलों को नुकसान होगा, जिससे उपज की बाजार में कीमत कम हो जाएगी। ये नुकसान किसानों के जीवन पर गहरा असर डालेगा।
किसानों की बढ़ेगी मुश्किलें
किसान बैंकों और सहकारी समितियों से कर्ज लेकर खेती करते हैं। फसल खराब होने से उन्हें कर्ज चुकाने में मुश्किल होगी और अगली रबी फसल के लिए भी उधार लेना पड़ सकता है। कई परिवारों में तय मांगलिक और सामाजिक काम भी रुक सकते हैं।
खेती से होने वाली आय ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार है। ऐसे में बारिश से हुआ ये नुकसान पूरे ग्रामीण जीवन को प्रभावित करेगा। किसानों को राहत तभी मिल सकती है जब उन्हें आदान अनुदान राशि और फसल बीमा क्लेम समय पर मिले। फसलों के खराब होने का असर आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा। बाजार में गुणवत्तायुक्त दालें और बाजरा उपलब्ध नहीं हो पाएगा। ये फसलें असिंचित खेती से होती हैं और जैविक मानी जाती हैं, इसलिए स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग भी अब इस प्राकृतिक और सुरक्षित उपज से वंचित रह सकते हैं।






