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भोजपुरी इंडस्ट्री के पावर स्टार पवन सिंह करीब डेढ़ साल बाद भाजपा में लौट आए हैं। मंगलवार, 30 सितंबर को दिल्ली में उपेंद्र कुशवाहा से मीटिंग के बाद विनोद तावड़े ने यह ऐलान किया। अब पवन सिंह के विधानसभा चुनाव लड़ने की चर्चा है।
भाजपा पवन सिंह को फिर से क्यों लेकर आई और उपेंद्र कुशवाहा से उनकी मुलाकात के पीछे की कहानी क्या है; जानेंगे, आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाहीं में…
सवाल-1ः पवन सिंह कब भाजपा में लौटे और किसने वापसी कराई?
जवाबः भोजपुर सुपर स्टार और सिंगर पवन सिंह 30 सितंबर को भाजपा में लौट आए। उनकी वापसी भाजपा के बिहार प्रभारी विनोद तावड़े ने कराई।
- मंगलवार, 30 सितंबर सुबह पवन सिंह तावड़े और भाजपा नेता ऋतुराज सिन्हा के साथ राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) सुप्रीमो उपेंद्र कुशवाहा से मिलने दिल्ली स्थित उनके आवास गए। पवन सिंह ने कुशवाहा से आशीर्वाद लिया।
- इसके बाद तावड़े ने पवन सिंह के भाजपा में आने का ऐलान किया। उन्होंने कहा, ‘पवन सिंह भाजपा कार्यकर्ता के तौर पर काम करते हुए NDA (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) को मजबूत करेंगे।’
- कुशवाहा से मुलाकात के बाद पवन सिंह गृह मंत्री अमित शाह से मिले। मुलाकात करीब 20 मिनट तक हुई।
- पवन सिंह के भाजपा में वापस आने से पहले सोमवार, 29 सितंबर रात विनोद तावड़े और राष्ट्रीय सचिव ऋतुराज सिन्हा ने कुशवाहा से मुलाकात की थी।
- कुशवाहा को पवन सिंह के बारे में जानकारी दी। उनकी सहमति के बाद ही अगली सुबह पवन सिंह को लेकर दोनों नेता उनके घर गए।
सवाल-2ः पवन सिंह को भाजपा ने कब पार्टी से निकाला था और क्यों?
जवाबः 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पवन सिंह को पश्चिम बंगाल की आसनसोल सीट से टिकट दिया था। तब ममता बनर्जी की TMC ने काफी विरोध किया था। पवन सिंह को बंगाली महिलाओं पर आधारित भोजपुरी गानों के लिए ट्रोल भी किया गया था। इसके बाद पार्टी ने टिकट वापस ले लिया।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पवन सिंह को बिहार से टिकट देने का आश्वासन दिया गया था। लेकिन जब टिकट नहीं मिला तो उन्होंने पार्टी से बगावत कर निर्दलीय लड़ने का ऐलान कर दिया।
वह काराकाट से निर्दलीय लड़े और दूसरे नंबर पर रहे, लेकिन उनके कारण NDA उम्मीदवार उपेंद्र कुशवाहा चुनाव हार गए।
निर्दलीय चुनाव लड़ने पर 22 मई 2024 को भाजपा ने पवन सिंह को पार्टी से बाहर कर दिया। उस वक्त पवन सिंह प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य थे।
सवाल-3ः पवन सिंह विधानसभा चुनाव लड़ेंगे क्या?
जवाबः हाल में पवन सिंह ने बिजनेस टायकून अशनीर ग्रोवर के रियलिटी शो ‘राइज एंड फॉल’ को छोड़ा है। शो से बाहर आने के दौरान उन्होंने कहा था, ‘मेरी जनता ही मेरा भगवान है और चुनाव के समय मेरा फर्ज है कि मैं उनके बीच रहूं।’
इस बयान का मतलब है कि वह अब पूरी तरह से राजनीति में एक्टिव होंगे। माना जा रहा है कि पवन सिंह आरा या काराकाट में से किसी एक विधानसभा सीट से चुनाव लड़ सकते हैं।
सवाल-4ः पार्टी से निकालने के डेढ़ साल बाद पवन सिंह को भाजपा ने क्यों वापस लिया?
जवाबः इसकी 2 बड़ी वजहें हैं…
1. शाहाबाद का जातीय समीकरण: पवन सिंह भोजपुर जिले से आते हैं। राजनीतिक दृष्टिकोण से यह शाहाबाद एरिया का हिस्सा है। शाहाबाद में 4 जिले भोजपुर, बक्सर, रोहतास और कैमूर आते हैं, जिनमें 22 विधानसभा सीटें हैं।
शाहाबाद की राजनीति को यादव, कुशवाहा और राजपूत प्रभावित करते हैं। करीब 10 से 12% कुशवाहा और राजपूत करीब 15% तक हैं। राजपूतों का ज्यादा असर रोहतास और भोजपुर में हैं।
वहीं, इस एरिया में यादव करीब 20% तक हैं। यही कारण है कि तीनों में से कोई दो जाति अगर एक साथ मिलती है तो समीकरण बदल जाता है।
पवन सिंह राजपूत समाज से आते हैं। माना जाता है कि उस एरिया में पवन सिंह के पीछे उनका समाज मजबूती से खड़ा है। इसे आंकड़ों से समझिए…
2024 लोकसभा चुनाव में पवन सिंह काराकाट से निर्दलीय चुनाव लड़े। दूसरे नंबर पर रहे। उनको 2.74 लाख वोट मिला, जो NDA के प्रत्याशी उपेंद्र कुशवाहा से 21 हजार अधिक था।
पॉलिटिकल एनालिस्ट संजय सिंह कहते हैं, ‘शाहाबाद से आने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री आरके सिंह के तेवर भी भाजपा पर कड़े हैं। ऐसे में उस एरिया में NDA को राजपूत वोटरों को साथ रखने के लिए किसी मजबूत चेहरे की जरूरत थी। पवन सिंह के साथ आने से यह पूरा हो सकता है।’

सवाल-4ः पार्टी से निकालने के डेढ़ साल बाद पवन सिंह को भाजपा ने क्यों वापस लिया?
जवाबः इसकी 2 बड़ी वजहें हैं…
1. शाहाबाद का जातीय समीकरण: पवन सिंह भोजपुर जिले से आते हैं। राजनीतिक दृष्टिकोण से यह शाहाबाद एरिया का हिस्सा है। शाहाबाद में 4 जिले भोजपुर, बक्सर, रोहतास और कैमूर आते हैं, जिनमें 22 विधानसभा सीटें हैं।
शाहाबाद की राजनीति को यादव, कुशवाहा और राजपूत प्रभावित करते हैं। करीब 10 से 12% कुशवाहा और राजपूत करीब 15% तक हैं। राजपूतों का ज्यादा असर रोहतास और भोजपुर में हैं।
वहीं, इस एरिया में यादव करीब 20% तक हैं। यही कारण है कि तीनों में से कोई दो जाति अगर एक साथ मिलती है तो समीकरण बदल जाता है।
पवन सिंह राजपूत समाज से आते हैं। माना जाता है कि उस एरिया में पवन सिंह के पीछे उनका समाज मजबूती से खड़ा है। इसे आंकड़ों से समझिए…
2024 लोकसभा चुनाव में पवन सिंह काराकाट से निर्दलीय चुनाव लड़े। दूसरे नंबर पर रहे। उनको 2.74 लाख वोट मिला, जो NDA के प्रत्याशी उपेंद्र कुशवाहा से 21 हजार अधिक था।
पॉलिटिकल एनालिस्ट संजय सिंह कहते हैं, ‘शाहाबाद से आने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री आरके सिंह के तेवर भी भाजपा पर कड़े हैं। ऐसे में उस एरिया में NDA को राजपूत वोटरों को साथ रखने के लिए किसी मजबूत चेहरे की जरूरत थी। पवन सिंह के साथ आने से यह पूरा हो सकता है।’

2. पवन सिंह की लोकप्रियता और चुनाव लड़ने की जिदः भोजपुरी बेल्ट में पवन सिंह खासे लोकप्रिय हैं। पॉलिटिकल एनालिस्ट संजय सिंह कहते हैं, ‘पवन सिंह की लोकप्रियता भोजपुरी भाषी ग्रामीण और शहरी वोटरों में बराबर है। इसलिए उन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल था। पवन सिंह ने चुनाव लड़ने का मन बना लिया था। ऐसे में भाजपा ने सोचा कि अगर उन्हें नहीं मनाया गया तो लोकसभा चुनाव की तरह नुकसान पहुंचा सकते हैं।’
संजय सिंह कहते हैं, ‘पवन सिंह के बगावत के कारण भाजपा को लोकसभा चुनाव में आरा, काराकाट, औरंगाबाद और बक्सर सीट पर नुकसान हुआ था।’
सवाल-5ः पवन सिंह के उपेंद्र कुशवाहा से मिलने का मतलब क्या है?
जवाबः 30 सितंबर को पवन सिंह जब कुशवाहा के घर गए तो उन्होंने पैर छूकर आशीर्वाद लिया। इसकी तस्वीर बाहर आई।
पॉलिटिकल एनालिस्ट अरुण पांडेय कहते हैं, ‘उपेंद्र कुशवाहा NDA के अहम हिस्सा हैं। पवन सिंह ने उनके खिलाफ ही बगावत की थी। इससे कुशवाहा नाराज थे। इसका दर्द बार-बार उनके बयानों में झलकता था।’
आगे अरुण पांडेय कहते हैं, ‘पवन सिंह जिस एरिया (शाहाबाद) से आते हैं वहां राजपूत और कुशवाहा दोनों अहम फैक्टर है। इसलिए दोनों का मिलना जरूरी था। अगर भाजपा बिना कुशवाहा को कॉन्फिडेंस में लिए शामिल करती तो उनके समर्थक नाराज हो सकते थे।’
अरुण पांडेय कहते हैं, ‘उपेंद्र कुशवाहा के साथ पवन सिंह की जो तस्वीर आई है, वह उनके समर्थकों के लिए है। जमीन तक मैसेज पहुंचाना है कि दोनों नेता (राजपूत-कुशवाहा) एक हो गए हैं।’
उपेंद्र कुशवाहा के एक बयान से इसका मतलब समझिए…
सिर्फ हाथ मिलाने से कुछ नहीं होगा, जब तक दिल नहीं मिलता, तब तक सफलता संभव नहीं है। बड़े-बड़े नेता भाषण देते रहते हैं, लेकिन जब जमीनी स्तर पर एकता की कमी होती है, तो चुनाव में हार का सामना करना पड़ता है। -उपेंद्र कुशवाहा, 31 जनवरी, औरंगाबाद
सवाल-6ः कुशवाहा और पवन सिंह अगर साथ आते हैं तो क्या नया समीकरण बनेगा?
जवाबः कुशवाहा और पवन सिंह दोनों का प्रभाव शाहाबाद एरिया में ज्यादा है। वहां राजपूत और कुशवाहा वोटर निर्णायक फैक्टर हैं।
पॉलिटिकल एनालिस्ट अरुण पांडेय के मुताबिक, दोनों की आपसी लड़ाई का फायदा महागठबंधन को हो सकता था। जैसे 2024 लोकसभा चुनाव में हुआ था। इसे आंकड़ों से समझिए…
अरुण पांडेय बताते हैं, ‘शाहाबाद में लोकसभा की 4 सीटें आरा, काराकाट, औरंगाबाद और बक्सर है। 2024 में काराकाट में उपेंद्र कुशवाहा और पवन सिंह आमने-सामने थे। इसका असर सभी सीटों पर पड़ा।’
‘राजपूतों ने कुशवाहा को वोट नहीं किया और कुशवाहा ने राजपूतों को वोट नहीं किया। वहीं, लालू यादव ने कुशवाहा उम्मीदवारों को टिकट देकर यादव, मुस्लिम और कुशवाहा समीकरण बना दिया। इसका उन्हें फायदा हुआ और उस एरिया की सभी सीटों पर जीत गए।’
मतलब, दोनों साथ मिल गए तो वह अपने वोट को एक-दूसरे को ट्रांसफर करा सकते हैं और विधानसभा चुनाव में फायदा NDA को हो सकता है।

सवाल-7ः शाहाबाद NDA के लिए महत्वपूर्ण क्यों है और पिछले चुनाव का रिजल्ट कैसा था?
जवाबः 2020 विधानसभा चुनाव में NDA का सबसे खराब प्रदर्शन शाहाबाद एरिया में था। विधानसभा की 22 सीटों में NDA सिर्फ दो सीटों पर जीत पाया था। 19 सीटें महागठबंधन और 1 सीट BSP जीती थी।
इसलिए सत्ता में वापसी के लिए NDA को शाहाबाद में जीतना जरूरी है। 2010 वाली स्थिति पाने के लिए NDA ने 3 बड़े कदम उठाए हैं…
1. पवन सिंह की पार्टी में वापसीः करीब डेढ़ साल बाद 30 सितंबर को पवन सिंह को भाजपा ने पार्टी में वापस ले लिया है।
2. आनंद मिश्रा को वापसीः 19 अगस्त को आनंद मिश्रा पार्टी में वापस आ गए। ब्राह्मण समाज से आने वाले मिश्रा 2024 में बक्सर से लोकसभा चुनाव निर्दलीय लड़े थे। उनको 47,409 वोट मिला था और भाजपा के मिथिलेश तिवारी 30,109 वोटों से हार गए थे।
3. उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजाः 2024 लोकसभा चुनाव हारने के बाद अगस्त 2024 में उपेंद्र कुशवाहा को NDA ने राज्यसभा भेज दिया।
मतलब, विधानसभा चुनाव से पहले NDA ने शाहाबाद को साधने के लिए कुशवाहा, राजपूत और ब्राह्मण के गणित को ठीक करने का प्रयास किया ह






