⛽ BIG SHIFT! सऊदी से बढ़ा तेल आयात, फरवरी में रिकॉर्ड; रूस पीछे छूटा


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भारत इस महीने सऊदी अरब से पिछले छह वर्षों में सबसे अधिक कच्चे तेल का आयात करने की तैयारी में है। इसकी बड़ी वजह अमेरिका का वह दबाव माना जा रहा है, जिसके तहत भारत से रूस से तेल खरीद घटाने को कहा जा रहा है। बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति रणनीति में संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है।

रूस पर अमेरिकी प्रतिबंधों और बढ़ते भू-राजनीतिक दबाव के बीच भारत की कच्चे तेल आयात रणनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक फरवरी महीने में सऊदी अरब से भारत का कच्चा तेल आयात नवंबर 2019 के बाद अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। अनुमान है कि पूरे महीने के आधार पर यह आयात औसतन 1 से 1.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन (mbd) रहेगा, जबकि 20 फरवरी के आसपास यह 1.3 mbd तक पहुंच गया था। इस उछाल के साथ सऊदी अरब अस्थायी रूप से रूस को पीछे छोड़कर भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया।

ग्लोबल डेटा और एनालिटिक्स कंपनी Kpler के अनुसार, फरवरी में रूस से कच्चे तेल की आपूर्ति लगभग 1 से 1.2 mbd के बीच रही। हालांकि अगले महीने इसमें गिरावट आकर 0.8 से 1 mbd तक रहने का अनुमान है। यह गिरावट ऐसे समय में दर्ज की जा रही है जब अमेरिका रूस से तेल खरीद कम करने के लिए भारत पर दबाव बना रहा है।

गौरतलब है कि 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के चलते रूसी कच्चा तेल भारी छूट पर उपलब्ध था। उस समय भारत ने अवसर का लाभ उठाते हुए रूस से आयात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की थी और यह आंकड़ा अपने चरम पर लगभग 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया था। परिणामस्वरूप, रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया था, जबकि सऊदी अरब तीसरे या चौथे स्थान पर खिसक गया था।

हालांकि अब स्थिति बदलती दिख रही है। फरवरी में सऊदी अरब और रूस के बीच आपूर्ति का अंतर काफी कम हो गया है। विश्लेषकों का मानना है कि मार्च और अप्रैल में रूसी आपूर्ति में और गिरावट आ सकती है। इसकी एक वजह यह भी है कि रूसी कच्चे तेल पर अधिक निर्भर कुछ भारतीय रिफाइनरियां—जैसे वडोदरा स्थित नायरा रिफाइनरी—अप्रैल-मई में रखरखाव (मेंटेनेंस) के लिए बंद रहने वाली हैं।

इस बीच इराक और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भी भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में बने हुए हैं, लेकिन फरवरी के ताजा आंकड़े संकेत देते हैं कि सऊदी अरब ने अस्थायी रूप से बढ़त बना ली है।

कुल मिलाकर, भारत की ऊर्जा नीति मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप संतुलन साधने की कोशिश करती दिख रही है। एक ओर सस्ती आपूर्ति और रणनीतिक लाभ का ध्यान रखा जा रहा है, तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय दबाव और प्रतिबंधों को भी ध्यान में रखते हुए आयात स्रोतों में विविधता लाई जा रही है।

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