“नीतीश के बाद नेतृत्व किसके हाथ? महागठबंधन में शुरू हुई उत्तराधिकारी की जंग, कई दावेदार मैदान में”


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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने जहां एनडीए को शानदार बहुमत दिलाया है, वहीं गठबंधन के भीतर नई महत्वाकांक्षाएँ और नेतृत्व को लेकर खींचतान भी उभरने लगी है। जीत के बावजूद एनडीए के सभी घटक दल अपनी-अपनी राजनीतिक भूमिका और भविष्य की ताकत बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं। दूसरी ओर, महागठबंधन के सामने हार के घाव भरने के साथ-साथ नई चुनौती खड़ी हो गई है—2025 के बाद की राजनीति के लिए साझा रणनीति तैयार करना और यह तय करना कि आगे नेतृत्व किसके हाथ में होगा। विपक्षी दलों को अपनी ‘विरासत’ और विश्वसनीयता दोनों की लड़ाई लड़नी है, ताकि वे आने वाले राजनीतिक दौर में मजबूती से खड़े हो सकें।

nitish kumar chirag paswan tejashwi yadav and prashant kishor

बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है। जिस वक्त I.N.D.I.A. ब्लॉक ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया था, तब BJP-JDU ने दावा किया था कि बिहार की राजनीति में “नए चेहरे के लिए कोई वैकेंसी नहीं है”—और नतीजों ने इसे सही साबित किया। NDA को प्रचंड बहुमत मिला और यह लगभग तय माना जा रहा है कि 2025 से 2030 तक नीतीश कुमार ही राज्य की कमान संभालेंगे।

लेकिन चुनाव बाद शांत होते माहौल में यह भी साफ होने लगा है कि दोनों ही पक्षों—NDA और महागठबंधन—में नेतृत्व के भविष्य को लेकर बड़ी ‘वैकेंसी’ पैदा हो रही है। नीतीश कुमार के 75 वर्ष की उम्र में संभवतः आखिरी चुनाव लड़ने की धारणा के बाद यह सवाल और गहरा हो गया है कि JDU में उनकी विरासत को आगे कौन संभालेगा, क्योंकि पार्टी में अभी ऐसा कोई चेहरा दिखाई नहीं देता। वहीं, BJP ने भी नीतीश की छाया में कभी कोई स्वतंत्र और प्रभावी राज्य-स्तरीय नेतृत्व नहीं खड़ा किया, जिस कारण भविष्य की राह धुंधली दिख रही है। LJP (R) के चिराग पासवान खुद को इस स्पेस में फिट देखते हैं और वे डिप्टी सीएम से आगे की भूमिका तक के लिए तैयारी में दिख रहे हैं।

दूसरी ओर, RJD के लिए इस चुनाव ने चेतावनी की घंटी बजा दी है। मुस्लिम वोटों के खिसकने, लगातार हार और लालू परिवार में जारी कलह के बीच पार्टी का पारंपरिक ‘वोट बैंक’ और विपक्षी स्पेस दोनों संकट में दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस भी अब RJD के साथ गठबंधन पर पुनर्विचार कर रही है, जबकि प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी धीरे-धीरे अपना एक अलग असर जमाने की कोशिश में है।

कुल मिलाकर, बिहार की राजनीति ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है जहां सत्ता पक्ष हो या विपक्ष—दोनों ही अपने अगले नेतृत्व और राजनीतिक भविष्य को लेकर नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

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