Mangal Pradosh Vrat 2025: शिव-हनुमान की कृपा पाने का शुभ अवसर, जानें कैसे हनुमान जी ने एक वृद्ध भक्त की आस्था की परीक्षा ली


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मंगल प्रदोष व्रत को अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत के पालन से व्यक्ति की अनेक शारीरिक और मानसिक व्याधियों का नाश होता है, साथ ही ऋण-मुक्ति, परिवार में सुख-शांति और लक्ष्मी-कृपा प्राप्त होती है। इस व्रत में गेहूं और गुड़ का सेवन किया जाता है, भगवान शिव को लाल पुष्प अर्पित किए जाते हैं और व्रतधारी लाल वस्त्र धारण करते हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, मंगल प्रदोष का विधिपूर्वक पालन करने से पापों से मुक्ति और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का आशीर्वाद मिलता है।

मंगल प्रदोष व्रत की पावन कथा एक अत्यंत श्रद्धालु बुढ़िया और उसके इकलौते पुत्र मंगल के इर्द-गिर्द घूमती है। यह बुढ़िया हर मंगलवार को हनुमानजी का व्रत रखती थी। व्रत की मर्यादा के अनुसार वह उस दिन घर को लीपती नहीं थी, न ही मिट्टी खोदने जैसे किसी कार्य को हाथ लगाती थी। पूरे भाव और समर्पण के साथ वह हनुमानजी को गेहूं-गुड़ से बने चूरमे का भोग लगाती और पूरे दिन उपवास रखती थी। कई वर्षों तक लगातार व्रत करने के बाद हनुमानजी ने उसकी भक्ति की परीक्षा लेने का संकल्प किया।

एक दिन वे साधु के रूप में उसके घर पहुंचे और जोर से पुकारा—“क्या कोई हनुमान भक्त है जो मेरी इच्छा पूरी कर सके?” बुढ़िया आदर से बाहर आई और सेवा का वचन दिया। साधु रूपी हनुमानजी ने पहले उससे घर की कुछ जमीन लीपने को कहा, पर बुढ़िया ने विनम्रता से कहा कि व्रत की मर्यादाओं के कारण वह मिट्टी से जुड़े कार्य नहीं कर सकती। जब तीन बार आश्वस्त करने के बाद साधु यह मान गए कि वह सचमुच व्रत का पालन कर रही है, तो उन्होंने दूसरी शर्त रखी—अपने ही बेटे मंगल की पीठ पर आग जलाकर भोजन बनाने की।

यह सुनकर बुढ़िया का हृदय कांप उठा। अपने बेटे से अधिक प्रिय उसके लिए कुछ न था, किंतु उसने व्रत की प्रतिज्ञा निभाने का संकल्प किया था। भारी मन से उसने पुत्र मंगल को साधु को सौंप दिया। साधु ने स्वयं बुढ़िया से ही बेटे की पीठ पर आग जलवाई और भोजन तैयार किया। बुढ़िया दर्द और असमंजस में अपने घर के भीतर चली गई, पर माथे पर भक्ति की रेखा ज्यों की त्यों बनी रही।

थोड़ी देर बाद साधु ने भोजन बनाकर बुढ़िया को बुलाया और कहा—“अपने पुत्र मंगल को भी बुला ले, वह भी भोजन कर ले।” यह सुनकर बुढ़िया रो पड़ी और बोली कि उसका बेटा अब जीवित नहीं होगा। लेकिन साधु के आग्रह पर उसने उसे पुकारा—और चमत्कार! मंगल स्वस्थ और हंसते हुए बाहर आया, जैसे उसे कोई क्षति हुई ही न हो।

यह देखकर बुढ़िया आश्चर्य और श्रद्धा से भर उठी। साधु ने तुरंत अपना वास्तविक स्वरूप धारण कर लिया—वह कोई और नहीं, स्वयं हनुमानजी थे। उन्होंने बुढ़िया को आशीर्वाद दिया और कहा कि उसकी अटूट आस्था, व्रत पालन की पवित्रता और दृढ़ विश्वास ने ही यह करुणा और चमत्कार संभव किया है।

कथा यह संदेश देती है कि मंगलवार प्रदोष व्रत श्रद्धा और सच्ची निष्ठा से करने पर शिवजी और रुद्रावतार हनुमानजी दोनों विशेष कृपा करते हैं, संकट दूर होते हैं, और भक्त जीवन में अद्भुत संरक्षण तथा आशीर्वाद प्राप्त करता है।

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