![]()
कौन थे डॉ. लालजी सिंह?
5 जुलाई 1947 को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में कलवारी गांव के एक किसान परिवार में जन्मे डॉ. लालजी सिंह ने पहली बार डीएनए फिंगर प्रिंटिंग का पता लगाया था, लेकिन दुनिया के सामने इसे साबित करने में सर एलके जेफ्रीज से पीछे रह गए। एलके जेफ्रीज ने साल 1984 में डीएनए फिंगरप्रिंट की खोज की थी। लेकिन डॉ. लालजी ने साल 1974 में ही इससे संबंधित बीकेएम (बैंडेड करैत माइनर) प्रोब का पता लगा लिया था।
डर के बावजूद सांपों पर रिसर्च
उन्होंने 12वीं क्लास तक की पढ़ाई अपने जिले के स्कूल से की थी, लेकिन आगे की पढ़ाई साल 1962 में वाराणसी चले आए। लालजी सिंह ने बनारल हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) से बीएससी, एमएससी और 1971 पीएचडी की थी।
जब लालजी बीएचयू से साइटोजेनेटिक्स में पीएचडी कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने सांपों के क्रोमोसोम्स पर रिसर्च करने की जिम्मेदारी दी गई है। कहा जाता है कि उन्हें सापों से डर लगता था, लेकिन उन्होंने सांपों पर सिर्च की और कुछ नया सीखने का जुनून नहीं छोड़ा।
जब जहाज में कंटेनर भरकर सांप लेकर विदेश गए लालजी
सांपों के लिंग निर्धारण पर रिसर्च करते हुए उन्हें उसके डीएनए में एक तत्व बीकेएम (बैंडड करैत माइनर) प्रोब के बारे में पता चला। उन्होंने स्टडी में पाया कि इस तत्व की वजह से हर सांप की एक यूनिक पहचान यानी जेनेटिक पहचान तय हो रही है। यह खास डीएनए चिन्ह था, लेकिन भारत में टेस्ट करने की मशीनें नहीं थीं। इसलिए वे साल 1974 में एक कंटेनर करैत सांप भरकर स्कॉटलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग पहुंच गए।
किसान के बेटे की खोज से हैरान थे दुनियाभर के वैज्ञानिक
यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग, स्कॉटलैंड की ब्रिटिश जेनेटिक लैब में लालजी ने साबित किया कि उन्होंने जो खोज की है वो सच है। यहीं से डीएनए फिंगरप्रिंट की शुरुआत हुई। उनकी इस अनोखी खोज से दुनियाभर के वैज्ञानिक हैरान रह गए थे। वे डीएनए फिंगप्रिंट टेक्निक की खोज के आखिरी पड़ाव पर ही थे कि 1984 में इंसानों के जीन्स पर टेस्ट करके सर एलके जेफ्रीज ने डीएनए फिंगरप्रिंट की खोज की घोषणा कर दी।
भारत में DNA फिंगर प्रिंटिंग के जनक
इसके बाद डॉ. लालजी सिंह ने भारत आकर डीएनए फिंगप्रिंट तकनीक को और विकसित किया, जिसने फॉरेंसिक साइंस और क्राइम इन्वेस्टिगेशन में क्रांति ला दी। उन्होंने कोर्ट केस में डीएनए फिंगरप्रिंट तकनीक का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
शव की पहचान करने, पितृत्व साबित करने के मामले, तंदूर कांड और राजीव गांधी हत्याकांड मामले में लालजी की खोज ने अहम भूमिका निभाई। उन्हें भारत में डीएनए फिंगरप्रिंट के जनक कहा जाने लगा। उन्होंने साबित किया कि भारत के लोगों ने अपनी शुरुआत 60,000 साल पहले अफ्रीका से की थी।
1 रुपये सैलरी लेते थे लालजी सिंह
लालजी सिंह के 50 से ज्यादा रिसर्च पेपर प्रकाशित हुए। डॉ. लालजी सिंह साल 2011 से 2014 तक बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। बतौर कुलपति उन्होंने केवल एक रुपये सैलरी ली थी। साल 2004 में इंडियन साइंस और टेक्नोलॉजी सेक्टर में उनके योगादान के लिए पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया था।
डॉ. लालजी सिंह की उपलब्धियां
- उन्होंने 1987 में हैदराबाद के सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (CCMB) के साथ अपने वैज्ञानिक जीवन की शुरुआत की थी।
- 1995 में हैदराबाद में सेंटर फॉर DNA फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स (CDFD) की खोला।
- साल 1998 में वन्य जीव संरक्षण संबंधी टेस्टिंग के लिए लेबोरेटरी फॉर द कॉन्सर्वेशन ऑफ एंडेंजर्ड स्पीशीज (LaCONES) की स्थापना की।
- साल 2004 में अपने पैतृक गांव में जीनोम फाउंडेशन खोला, जिसका उद्देश्य गांवों में रहने वाले लोगों को जेनेटिक डिसिज का इलाज उपलब्ध कराना है।
डीएनए फिंगर प्रिंटिंग क्या है?
बीते कुछ सालों के दौरान कई पितृत्व व आपराधिक गुत्थियों को सुलझाने में डीएनए फिंगर प्रिंटिंग तकनीक बहुत उपयोगी सिद्ध हुई है। यह पूरी प्रक्रिया डीएनए पर आधारित होती है। ‘सभी मनुष्यों, जीव-जन्तुओं की कोशिकाओं में एक रसायन डीएनए रहता है जो मनुष्य को उसकी यूनिक पहचान पता करता है। यह डीएनए शरीर के किसी भी हिस्से लार, रक्त, बाल, वीर्य आदि से प्राप्त किया जा सकता है।
केमिकल मैथेड के जरिए प्राप्त डीएनए को अलग-अलग खंडों में बांटा जाता है। फिर उन्हें रेडियो सक्रिय बनाने के बाद उनका एक विशिष्ट क्रम प्राप्त होता है। यह क्रम ही वह विशिष्ट क्रम होता है जो उस व्यक्ति को अन्य लोगों से अलग करता है। इसके बाद इसकी छानबीन करके इसे एक्स-रे फिल्म पर एक्सपोज किया जाता है, जहां वह ब्लैक बार बनाते हैं। इसे ही डीएनए फिंगरप्रिंटिंग कहते हैं।






