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अफ्रीकी देश माली इस वक्त बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा है। यहां हालात इतने बिगड़ गए हैं कि देश की राजधानी बमाको पर आतंकियों का साया मंडराने लगा है। बताया जा रहा है कि अलकायदा से जुड़े गुट जमात नुसरत अल-इस्लाम वल मुस्लिमीन (JNIM) ने राजधानी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया है। यह वही गुट है जिसने पिछले कुछ वर्षों में माली के बड़े हिस्से पर अपना कब्जा जमाया और अब वह सत्ता की जड़ें हिला देने वाली रणनीति पर काम कर रहा है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि बमाको की ओर आने वाली सभी प्रमुख सड़कों पर जिहादी लड़ाकों ने नाकेबंदी कर दी है। उन्होंने तेल के टैंकरों और सेना के गश्ती दलों पर लगातार हमले किए हैं, जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा है।

रिपोर्टों के मुताबिक, इन हमलों की वजह से माली में ईंधन संकट पैदा हो गया है। पेट्रोल पंपों पर वाहनों की लंबी कतारें लग रही हैं, लोगों को पेट्रोल नहीं मिल पा रहा और स्कूल-कॉलेज बंद करने पड़े हैं। राजधानी में आम जनजीवन लगभग ठप हो गया है। नागरिकों में भय और असुरक्षा का माहौल है। खास बात यह है कि JNIM ने अपने इस अभियान को “आर्थिक युद्ध” का नाम दिया है। उनकी रणनीति सरकार को सीधे हथियारों से नहीं बल्कि आर्थिक रूप से पंगु बनाकर गिराने की है।
सीएनएन की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि माली की सेना और उसके रूसी सहयोगी वैगनर ग्रुप इस संकट से निपटने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जिहादी गुटों की ताकत इतनी बढ़ चुकी है कि उन्हें रोकना मुश्किल हो रहा है। सेना ने हवाई हमलों की संख्या बढ़ाई है, लेकिन ईंधन की भारी कमी और संचार बाधाओं के कारण सैन्य टुकड़ियां अलग-थलग पड़ती जा रही हैं।
जानकारों के अनुसार, JNIM की जड़ें बहुत गहरी हैं। यह संगठन 2017 में माली के कई स्थानीय जिहादी गुटों के एकीकरण से बना था और इसकी वफादारी सीधे अलकायदा नेटवर्क से जुड़ी है। बीते कुछ वर्षों में इस संगठन ने माली के मध्य और पश्चिमी इलाकों में दर्जनों कारखानों, औद्योगिक इकाइयों और सोने की खदानों पर हमला किया है। इसका मकसद सिर्फ डर फैलाना नहीं बल्कि सरकार के संसाधनों और विदेशी निवेश को तबाह करना भी है।
विश्लेषकों का मानना है कि माली में अगर स्थिति इसी तरह बिगड़ती रही तो देश में एक बार फिर तख्तापलट या सत्ता परिवर्तन देखने को मिल सकता है। मौजूदा सैन्य शासक असीमी गोइता पहले ही राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे हैं, ऐसे में राजधानी तक आतंकियों का पहुंचना पूरे क्षेत्र को हिला सकता है। यह सिर्फ माली के लिए ही नहीं बल्कि पूरे सहेल क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी है, जहां पहले से ही कई उग्रवादी गुट सक्रिय हैं।
हालांकि सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि JNIM का मकसद अभी बमाको पर सीधा कब्जा करना नहीं है, बल्कि वह शहर को घेरकर सरकार के खिलाफ असंतोष और विद्रोह की लहर पैदा करना चाहता है। वे स्थानीय समुदायों के बीच जाकर गरीब तबके और जातीय अल्पसंख्यकों की समस्याओं को उठाकर उनके बीच अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं। धीरे-धीरे यह गुट लोगों की सहानुभूति हासिल कर रहा है और खुद को सरकार का विकल्प बताने की कोशिश कर रहा है।
माना जा रहा है कि आने वाले समय में JNIM राजधानी में राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने की कोशिश करेगा — यानी वह सीधे शासन नहीं करेगा, लेकिन अपनी पसंद की सरकार बनवाने या मौजूदा नेतृत्व को झुकाने का प्रयास करेगा। माली में यह संकट अब केवल सुरक्षा का नहीं बल्कि राजनीतिक और मानवीय आपदा का रूप ले चुका है। यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने जल्द हस्तक्षेप नहीं किया तो यह पूरा इलाका एक बार फिर अलकायदा और अन्य आतंकवादी संगठनों का गढ़ बन सकता है।






