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अफगानिस्तान में असीम मुनीर और सिराजुद्दीन हक्कानी के बीच बढ़ते टकराव ने पूरे क्षेत्र में तनाव का माहौल पैदा कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक, तालिबान अब अमेरिकी ड्रोन हमलों के जवाब में आत्मघाती हमलों की रणनीति दोबारा अपनाने की तैयारी कर रहा है। यही नहीं, पाकिस्तान में भी आने वाले दिनों में ऐसे आत्मघाती हमलों की बाढ़ आने की आशंका जताई जा रही है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर पाकिस्तान अफगानिस्तान की सीमा में ड्रोन हमले जारी रखता है, तो इसका सीधा और खतरनाक असर दोनों देशों पर पड़ेगा। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि तालिबान ने अपनी आतंकी शाखाओं के जरिए नए भर्ती अभियान भी शुरू कर दिए हैं। सुरक्षा एजेंसियां आशंका जता रही हैं कि आने वाले हफ्तों में पाकिस्तान के कई हिस्सों में हिंसा और धमाकों का सिलसिला देखने को मिल सकता है।
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पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव अब नए और खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। कभी पाकिस्तान की सबसे बड़ी “रणनीतिक संपत्ति” माने जाने वाले सिराजुद्दीन हक्कानी आज उसी पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं। आईएसआई, जिसने दशकों तक अफगानिस्तान की राजनीति और तालिबान की गतिविधियों को नियंत्रित करने का दावा किया था, अब पूरी तरह से असहाय नज़र आ रही है। 2021 में जब तालिबान ने काबुल पर कब्जा किया था, तब पाकिस्तान ने इसे अपनी कूटनीतिक जीत माना था। उसे विश्वास था कि नई तालिबान सरकार उसकी कठपुतली बन जाएगी और इस्लामाबाद के इशारों पर नाचेगी। लेकिन यह सोच गलत साबित हुई — तालिबान ने अपनी राह खुद तय की और पाकिस्तान का प्रभाव सीमित कर दिया।
अब हालात इस हद तक बिगड़ चुके हैं कि तालिबान और हक्कानी नेटवर्क दोनों ही पाकिस्तान को “दुश्मन” की नजर से देखने लगे हैं। सिराजुद्दीन हक्कानी, जो कभी आईएसआई की योजना का अहम हिस्सा थे, अब खुले तौर पर पाकिस्तान की नीतियों की आलोचना कर रहे हैं और चेतावनी दे रहे हैं कि अगर पाकिस्तान ने अफगानिस्तान की संप्रभुता में दखल देने की कोशिश की, तो उसका नतीजा खौफनाक होगा। सूत्रों के अनुसार, अफगानिस्तान में अब तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के बीच गहरा गठबंधन बन चुका है — और पाकिस्तान की रणनीति कि दोनों गुटों को आपस में भिड़ाया जाए, पूरी तरह से नाकाम हो चुकी है।
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जानकारी के मुताबिक, पाकिस्तान ने हाल ही में अफगानिस्तान में अपने “पुराने तरीकों” को दोहराने की कोशिश की — यानी काबुल ग्रुप और कांधार ग्रुप के बीच मतभेद भड़काने का। परंतु इस बार तालिबान ने इसे पहचान लिया। मुल्ला बरादर और सिराजुद्दीन हक्कानी, जिनके बीच पहले दूरी थी, अब एक मंच पर आ गए हैं। दोनों नेताओं ने मिलकर पाकिस्तान को साफ संदेश दिया है कि अफगानिस्तान अब किसी बाहरी नियंत्रण को बर्दाश्त नहीं करेगा।
दूसरी ओर, पाकिस्तान के अंदर भी आतंकवाद की समस्या तेजी से बढ़ती जा रही है। अफगान सीमा से सटे इलाकों में तालिबान समर्थित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) फिर से सक्रिय हो चुकी है। रिपोर्टों के अनुसार, हक्कानी नेटवर्क और तालिबान अब पाकिस्तान में आत्मघाती हमलों की नई लहर की तैयारी कर रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने अमेरिकी ड्रोन हमलों के जवाब में किया था। इससे पाकिस्तान में सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ गई है।
विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान ने अपनी कूटनीतिक और सुरक्षा नीति में जो “आग” दशकों पहले लगाई थी — यानी जिहाद और प्रॉक्सी वॉर की नीति — वही अब उसके घर को जलाने लगी है। आईएसआई के अधिकारी जिन आतंकवादी गुटों को कभी अपने मोहरे के रूप में इस्तेमाल करते थे, अब वही गुट पाकिस्तान की सेना और सरकार को चुनौती देने लगे हैं। हालात इस हद तक गंभीर हैं कि पाकिस्तान के अंदर भविष्य में बड़े धमाकों और हमलों की आशंका जताई जा रही है।
कुल मिलाकर, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रिश्तों का यह नया अध्याय एक ऐसे समय में खुला है जब दोनों देशों की सीमाएं अस्थिर हैं और आतंकवाद एक बार फिर सिर उठा रहा है। सिराजुद्दीन हक्कानी का यह “बगावत भरा रुख” पाकिस्तान की दशकों पुरानी नीतियों के लिए सबसे बड़ा झटका है। कभी जिस नेटवर्क को इस्लामाबाद ने अपने हितों के लिए खड़ा किया था, वही अब उसके खिलाफ हथियार उठाने की तैयारी में है। यानी पाकिस्तान की “रणनीतिक गहराई” अब “रणनीतिक खतरे” में बदल चुकी है — और यह खतरा आने वाले महीनों में और गहराने वाला है।






