क्या ट्रंप फिर दोहराने जा रहे हैं सोवियत दौर की ‘सस्ते तेल की साज़िश’?


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पुतिन ट्रंप

अनस्तासिया ज़िनोदा

 


समरी:
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन युद्ध में रूस को आर्थिक सहयोग देने वाली दो प्रमुख रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए हैं। इसे अब तक की ट्रंप प्रशासन की सबसे बड़ी कार्रवाई माना जा रहा है, जिससे पहली बार रूस पर सीधा आर्थिक दबाव पड़ा है। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप तेल को एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर यूक्रेन में शांति स्थापित करने की कोशिश कर सकते हैं। यह कदम सोवियत दौर की ‘तेल राजनीति’ की याद दिलाता है, जब तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने वैश्विक शक्तियों के समीकरण बदल दिए थे।


6 अक्तूबर 1973 को मिस्र और सीरिया के नेतृत्व में अरब देशों ने इसराइल पर हमला किया, जिसे योम किप्पुर युद्ध कहा जाता है। इस युद्ध में सोवियत संघ ने अरबों का और अमेरिका ने इसराइल का साथ दिया। जवाब में अरब देशों ने तेल आपूर्ति घटा दी, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाज़ार हिल गया और तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं। इतिहासकार डैनियल यरगिन के अनुसार, 1973 की तेल पाबंदी ने आधुनिक ऊर्जा युग की नींव रखी। बाद में 1979 में मिस्र-इसराइल शांति समझौते और ईरान क्रांति ने एक नए तेल संकट को जन्म दिया।

जीत और हार

ट्रांस साइबेरियन रेल लाइन

तेल संकट के बीच जहां अमेरिका और पश्चिमी यूरोप मंदी से जूझ रहे थे, वहीं सोवियत संघ ने अपेक्षाकृत स्थिरता बनाए रखी। साइबेरिया में बड़े तेल भंडार मिलने और कीमतों में उछाल से वह 1980 तक दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक बन गया। इससे सोवियत संघ ने अपने सहयोगी देशों को सस्ते दाम पर तेल उपलब्ध कराया और एक आर्थिक नेटवर्क खड़ा किया। तेल से आई संपन्नता ने सोवियत अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को ढक दिया, लेकिन रक्षा और तेल उद्योग पर अत्यधिक खर्च ने बाकी क्षेत्रों को पीछे छोड़ दिया। पश्चिमी नेताओं ने इसे ‘रॉकेटों वाला बुर्किना फ़ासो’ कहकर इसकी आंतरिक आर्थिक गिरावट पर तंज कसा।

वक़्त और पैसा

अफ़ग़ान युद्ध

1979 में अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत हमले के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने टेक्नोलॉजी निर्यात पर रोक लगा दी, जिससे सोवियत तेल उत्पादन पर सीधा असर पड़ा। 1980 के दशक की शुरुआत में वैश्विक मांग घटने और तेल की कीमतों में गिरावट से सोवियत बजट को बड़ा झटका लगा। पोलैंड में उथल-पुथल और मार्शल लॉ के बीच सोवियत संघ ने घाटा पूरा करने के लिए भारी कर्ज़ लिया। इतिहासकार टोनी जूड के शब्दों में, “सोवियत ब्लॉक न सिर्फ़ उधार लिए पैसे पर, बल्कि उधार लिए वक़्त पर भी चल रहा था।”

डील होगी या नहीं?

 

रोनाल्ड रीगन

1980 से 1986 के बीच तेल की कीमतें 35 डॉलर से गिरकर 10–15 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। पश्चिमी देशों ने ऊर्जा संरक्षण और घरेलू उत्पादन पर ध्यान देकर मध्य-पूर्व पर निर्भरता घटाई। यूक्रेन के अधिकारी आंद्रेई यरमक के मुताबिक, इसी दौर में अमेरिका और सऊदी अरब ने तेल उत्पादन बढ़ाकर सोवियत अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की रणनीति अपनाई, जिससे उसे भारी आर्थिक नुकसान हुआ और अंततः 1991 में उसका पतन हुआ। हालांकि, रीगन प्रशासन ने ऐसे किसी समझौते से इनकार किया और कई विशेषज्ञों ने इसे महज़ एक “साजिश सिद्धांत” करार दिया।

ऊर्जा निर्यात पर निर्भरता

मिख़ाइल गोर्बाचोफ़

1985 में मिख़ाइल गोर्बाचोफ़ ने सोवियत संघ का नेतृत्व संभालते हुए उम्मीद जताई कि तेल से मिलने वाली आमदनी से सुधारवादी नीतियाँ — ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका — को मजबूती मिलेगी। लेकिन गिरती वैश्विक तेल कीमतों और घरेलू सब्सिडी ने अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया। सब्सिडी खत्म होते ही सोवियत व्यवस्था बिखरने लगी और 1991 में उसका पतन हो गया। आज का रूस भी ऊर्जा निर्यात पर उतना ही निर्भर है — उसके कुल निर्यात का लगभग 60% और राजस्व का 40% तेल व गैस से आता है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूस चीन, भारत और तुर्की को तेल बेचकर यूक्रेन युद्ध की फंडिंग कर रहा है।

ड्रिल बेबी, ड्रिल!

ट्रंप

जनवरी 2025 में दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने “ड्रिल बेबी, ड्रिल” नीति का ऐलान किया, जिसका उद्देश्य घरेलू तेल उत्पादन बढ़ाना है। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप रीगन की तरह रूस पर आर्थिक दबाव डालने की रणनीति अपना सकते हैं। हालांकि, उनके नए प्रतिबंधों से फिलहाल वैश्विक तेल कीमतों में करीब 5% की बढ़ोतरी हुई है और ब्रेंट 65 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है। प्रतिबंधों के चलते सस्ता रूसी तेल यूराल्स भी प्रभावित हुआ है, जिससे खरीदारों के लिए दिक्कतें और मूल्य वार्ताओं में नई चुनौतियाँ पैदा हो सकती हैं।

रूस का अतीत और भविष्य

पुतिन

यूक्रेन द्वारा रूसी तेल रिफ़ाइनरियों और ऊर्जा ढांचे पर हमलों की तीव्रता बढ़ी है, जिससे रूस की युद्ध लागत पर दबाव बढ़ सकता है। बीबीसी रूसी सेवा की संपादक ओल्गा शेमीना के अनुसार, आज की रूसी अर्थव्यवस्था की ऊर्जा निर्भरता सोवियत दौर से भिन्न है। तब तेल की गिरती कीमतों ने सोवियत पतन में अहम भूमिका निभाई थी, जबकि मौजूदा रूस की अर्थव्यवस्था यूक्रेन युद्ध से पहले अपेक्षाकृत मज़बूत स्थिति में थी।

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