Ratan Tata Death Anniversary : रतन टाटा के जाते ही सालभर में कितना बदल गया टाटा ग्रुप, 157 साल में पहली बार हुआ ऐसा


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Ratan Tata Memory : देश के वेटरन कारोबारी रतन टाटा के निधन को एक साल हो चुके हैं. आज उनकी पुण्‍यतिथि है और इस एक साल में टाटा समूह के भीतर क्‍या-क्‍या बदलाव हुए, इसकी पड़ताल में कई रोचक तथ्‍य सामने आए हैं.

 

 

14 साल बाद फुल पॉवर में टाटा परिवार का सदस्‍य
रतन टाटा के निधन के बाद सबसे बड़ी चुनौती समूह को नया मुखिया देने की थी. कई नामों पर विचार हुआ और आखिर में आयरलैंड की नागरिकता वाले नोएल टाटा को इसके योग्‍य माना गया. नोएल टाटा पहले भी समूह की दूसरी कंपनियों में बतौर शीर्ष अधिकारी सेवाएं देते रहे हैं, लेकिन 14 साल में ऐसा पहली बार हुआ कि टाटा परिवार के किसी सदस्‍य को टाटा ट्रस्‍ट और टाटा संस दोनों की कमान सौंपी गई. रतन टाटा और नोएल टाटा सौतेले भाई हैं और नोएल को पिछले साल ही पहली बार टाटा संस के बोर्ड में शामिल किया गया. टाटा संस समूह की सभी कंपनियों की होल्डिंग कंपनी और इसमें टाटा ट्रस्‍ट की 65 फीसदी हिस्‍सेदारी है. इसका मतलब है कि अगर समूह पर पूरा कंट्रोल रखना है तो टाटा संस और ट्रस्‍ट दोनों की कमान किसी एक ही व्‍यक्ति के पास होनी चाहिए.रतन टाटा के जाते ही शुरू हो गया पॉवर गेम
भले ही नोएल टाटा को सारी कमान सौंप दी गई, लेकिन उनकी नियुक्ति से समूह में कई लोगों को नाराजगी रही. धीरे-धीरे विरोध के स्‍वर उठने लगे और एक समय ऐसा आया कि ट्रस्‍ट के अधिकारी 2 खेमें में बंट गए. नियुक्तियों और बोर्ड के फैसलों को लेकर विरोध होने लगे. कमान भले ही नोएल टाटा के पास रही, लेकिन उनकी बातों से अधिकारी सहमत नहीं होते थे. एसपी ग्रुप के निदेशक मेहली मिस्‍त्री जैसे पुराने सदस्‍यों ने गुट बनाने शुरू कर दिए और नोएल टाटा व टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखन के फैसलों में दखल देने लगे. टाटा संस के बोर्ड में नॉमिनी निदेशकों के रिटायर होने के बाद नई नियुक्ति के समय यह विरोध खुलकर सामने आ गया और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को भी इसमें दखल देना पड़ा

 

 

नई दिल्‍ली. भारत ने एक साल पहले आज ही के दिन अपने रत्‍न वेटरन उद्योगपति रतन टाटा को खोया था. आज उनकी पहली पुण्‍यतिथि है और पूरा देश अपने इस आइडियल को याद कर रहा है. उन्‍हें गए अभी सालभर ही बीता है, लेकिन टाटा समूह ने इतने छोटे से समय में वह सबकुछ देख लिया जो पिछले 157 साल में नहीं देखा था. इस दौरान टाटा समूह के नेतृत्‍व में कई बदलाव और उतार-चढ़ाव भी आए. रतन टाटा की गैर मौजूदगी में समूह के भीतर विरोध और सत्‍ता ध्रुवीकरण के विवाद भी लगातार सामने आते रहे. अंदरखाने का विद्रोह इस कदर बढ़ गया कि डेढ़ शताब्‍दी में पहली बार सरकार को समूह के भीतर दखल देना पड़ा.

टाटा समूह सिर्फ सबसे बड़ा उद्योग संगठन ही नहीं, देश के भरोसे का भी नाम है. लेकिन, इस समूह के भीतर शीर्ष अधिकारियों का एक-दूसरे पर भरोसा लगातार कम होता जा रहा है. यही कारण है कि टाटा समूह की सबसे बड़ी कंपनी टीसीएस ने 20 साल में पहली बार छंटनी का मुंह देखा. टीसीएस में हुई छंटनी ने उद्योग जगत के साथ पूरे देश के भरोसे को हिला दिया है. आज रतन टाटा की पुण्‍यतिथि पर हम इस बात की पड़ताल करते हैं कि इस एक साल के भीतर आखिर टाटा समहू में क्‍या-क्‍या बड़े बदलाव हुए हैं.
वसीयत में पुराने मित्रों को हिस्‍सेदारी
रतन टाटा ने अपनी वसीयत में परिवार के सदस्‍यों को हिस्‍सेदारी देने के साथ कुछ पुराने मित्रों को भी शामिल किया. इसमें एक युवा नाम शांतनु नायडू काफी चर्चा में रहा. रतन टाटा ने उनका एजुकेशन लोन माफ कर दिया और उनके स्‍टार्टअप ‘गुडफेलोज’ में अपनी हिस्‍सेदारी भी लौटा दी. रतन टाटा की इच्‍छा के अनुसार उन्‍हें टाटा मोटर्स में जनरल मैनेजर बना दिया गया है. फिलहाल शांतनु ई-व्‍हीकल के इनोवेशन पर काम करते हैं. रतन टाटा और शांतनु की दोस्‍ती साल 2016 में हुई थी और एक घटना के बाद दोनों ने एक-दूसरे के साथ चलने का फैसला किया था.
नई पीढ़ी को दी गई कमान
रतन टाटा के जाने के बाद टाटा समूह में नई पीढ़ी को कमान दी गई. नोएल टाटा की बेटी माया, लिआह और बेटे नेविल टाटा को सर रतन टाटा इंडस्ट्रियल इंस्‍टीट्यूट के बोर्ड ऑफ ट्रस्‍टीज में शामिल किया गया है. यह संस्‍थान महिलाओं की स्किल बढ़ाने और उन्‍हें ट्रेनिंग देने का काम करता है. उनकी दोनों बेटियां टाटा ट्रस्‍ट की भी ट्रस्‍टी हैं. माया टाटा काफी पहले से टाटा नियो ऐप की टीम का हिस्‍सा रही हैं. लिआह टाटा समूह के होटल विंग की वाइस प्रेसिडेंट हैं.

 

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