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यहां की हालत ऐसी है कि अगर लोग नौकरी करने बाहर नहीं जाएंगे, तो आदमी, आदमी को खा जाएगा। यहां के नेताओं ने 10-15 साल में कोई काम नहीं किया। सभी ने अपनी जेब गर्म की हैं। किशनगंज का सबसे बड़ा मुद्दा पलायन है। 1992 में मैंने डबल MA किया था। पैसे नहीं थे, इसलिए नौकरी नहीं मिली है। मजदूरी करके बच्चों को पाला है।’
55 साल के शमशुल ये बात कहते हैं, तो गुस्सा उनके चेहरे पर साफ दिखता है। शमशुल किशनगंज के चकला गांव में रहते हैं। दिल्ली, मुंबई और पंजाब में काम कर चुके हैं। बेरोजगारी और पलायन को सबसे बड़ा मुद्दा बताते हैं। गुस्सा इतना है कि चुनाव पर बात नहीं करना चाहते।
किशनगंज और चुनाव की बात आते ही सबसे पहले मुस्लिम वोट बैंक का जिक्र होने लगता है। किशनगंज उस सीमांचल का हिस्सा है, जिसमें कटिहार, पूर्णिया और अररिया भी शामिल हैं। चारों जिलों में विधानसभा की 24 सीटें हैं।

वक्फ-SIR से ज्यादा बड़े मुद्दे रोजगार और पलायन बिहार की जातीय गणना-2023 के मुताबिक, राज्य की 243 विधानसभा सीटों में से 47 पर मुस्लिम वोटर निर्णायक हैं। इनमें से 11 पर 40% से ज्यादा, 7 पर 30% से ज्यादा और 29 सीटों पर 20% से 30% मुस्लिम वोटर हैं।
मुस्लिमों का सबसे ज्यादा असर किशनगंज, कटिहार, अररिया और पूर्णिया में हैं। यहां के मुस्लिम इस बार चुनाव में क्या सोच रहे हैं, ये समझने के लिए दैनिक भास्कर सीमांचल के चारों जिलों में पहुंचा। उनसे ये सवाल पूछे-
1. चुनाव में मुस्लिमों के सबसे बड़े मुद्दे क्या हैं? 2. क्या वक्फ बिल, घुसपैठ और जातीय जनगणना चुनाव में असर डाल सकते हैं? 3. सीमांचल में नीतीश का जादू बरकरार है या तेजस्वी भारी दिख रहे हैं? 4. AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी और प्रशांत किशोर का कितना असर है?
जैसा नैरेटिव चल रहा है, उससे लगा था कि मुस्लिम वोटर वक्फ बिल और SIR में वोट कटने की बात कहेंगे, लेकिन उनके मुद्दे इनसे अलग निकले। बातचीत में तीन मुद्दे पलायन, रोजगार और पढ़ाई समझ आए।






