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बिहार विधानसभा चुनाव का माहौल गर्म है और इस बार फिर रोजगार बड़ा मुद्दा बन गया है। हर दल युवाओं को नौकरी देने का वादा कर रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर युवा अब इन वादों पर भरोसा नहीं कर पा रहे। 2020 में जो उम्मीदें थीं, वो अब मायूसी में बदल गई हैं। कॉलेजों से निकल रहे डिग्रीधारी छात्र आज भी बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं और मानते हैं कि नेता सिर्फ चुनाव के वक्त याद करते हैं।
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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का माहौल बनना शुरू हो गया है और एक बार फिर “रोजगार” चुनावी बहस का सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। मगर इस बार 2020 की तरह जोश नहीं, बल्कि एक गहरी निराशा और अविश्वास का भाव युवाओं के बीच दिखाई दे रहा है। पाँच साल पहले, तेजस्वी यादव के “पहली कैबिनेट में 10 लाख सरकारी नौकरी” वाले नारे ने बिहार के बेरोजगार युवाओं में उम्मीद की लहर पैदा की थी। उस समय यह मुद्दा इतना प्रभावशाली साबित हुआ कि NDA को भी 20 लाख रोजगार सृजन की घोषणा करनी पड़ी थी। लेकिन पाँच साल बीतने के बाद हालात पहले जैसे या शायद उससे भी कठिन नज़र आ रहे हैं।
राज्य भर में भर्ती परीक्षाओं के रद्द होने, पेपर लीक, और परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी ने युवाओं के भरोसे को गहरा झटका दिया है। पटना, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, और भागलपुर जैसे शहरों में हजारों छात्र कोचिंग सेंटरों में दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, पर उन्हें लगता है कि सरकार और सिस्टम दोनों उनकी मेहनत का मूल्य नहीं समझते। पटना के महेंद्रू इलाके में कोचिंग की तैयारी कर रहे अरुण गुप्ता जैसे छात्र कहते हैं, “हम बदलाव चाहते हैं, लेकिन अब कोई फर्क नहीं पड़ता। सभी एक जैसे हैं।”
गोपालगंज के मनीष यादव जैसे उम्मीदवारों का कहना है कि जो नेता रोजगार के वादे कर रहे हैं, उन्हें पहले पिछले पाँच साल का हिसाब देना चाहिए। वहीं खगड़िया के विकास कुमार जैसे युवाओं की मांग बहुत साधारण है—“हमें दो करोड़ नौकरियाँ नहीं चाहिए, बस परीक्षा समय पर और लीक-फ्री हो।” विकास जैसे हजारों युवा राज्य की व्यवस्था से इतना थक चुके हैं कि सरकारी नौकरी की चाह अब संघर्ष बन गई है।
दरभंगा और आसपास के इलाकों में युवाओं का रुझान बताता है कि अब सरकारी नौकरी का सपना धीरे-धीरे निजी काम या छोटे व्यापार में बदल रहा है। विवेक मंडल और सज्जन झा जैसे युवाओं ने सरकारी तैयारी छोड़कर माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में एजेंट की नौकरी अपनाई है, क्योंकि उन्हें अब किसी नेता या सिस्टम से उम्मीद नहीं बची। वहीं मुजफ्फरपुर की सोनम कुमारी जैसी महिला अभ्यर्थी मानती हैं कि नीतीश कुमार की महिला आरक्षण नीति ने उन्हें कुछ राहत दी है, लेकिन फिर भी रोजगार की स्थिरता एक बड़ा सवाल बनी हुई है।
राज्य की कुल 7.43 करोड़ मतदाता आबादी में लगभग 3.78 करोड़ युवा (20 से 40 वर्ष) के बीच हैं, यानी 51% वोटर युवा हैं। ये वही वर्ग है जो न सिर्फ बिहार की राजनीति की दिशा बदल सकता है बल्कि सत्ता तक पहुँचने की राह भी तय करता है। लेकिन इस बार युवा नारेबाज़ी से दूर हैं। न NDA पर भरोसा है, न RJD पर, और न ही किसी नए विकल्प पर। यहां तक कि जन सुराज अभियान के नेता प्रशांत किशोर, जिन्होंने शुरू में युवाओं का ध्यान खींचा था, अब उनके लिए भी उम्मीद का केंद्र नहीं रह गए हैं।
साफ है कि इस बार का बिहार चुनाव सिर्फ सत्ता बदलने की लड़ाई नहीं बल्कि भरोसा वापस लाने की चुनौती बन गया है। रोजगार के वादे अब चुनावी भाषणों में गूंजते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर युवा कहते हैं — “वादे बहुत हुए, अब भरोसा नहीं।” यह चुप्पी, यह खामोशी ही इस चुनाव की सबसे बड़ी कहानी है — एक ऐसी कहानी जिसमें बिहार का युवा अब बोल नहीं रहा, लेकिन सबको चुप कर देने वाला फैसला ज़रूर करेगा






