![]()
बिहार की ढाका विधानसभा सीट नेपाल की सीमा से सटी एक अहम सीमा क्षेत्र की सीट है। कभी यह कांग्रेस का मजबूत गढ़ मानी जाती थी, लेकिन 1990 में बीजेपी ने इस किले को ध्वस्त कर अपनी पकड़ बना ली। इसके बाद राजद ने भी यहाँ जीत का स्वाद चखा। पिछले कई चुनावों से यह सीट RJD और BJP के बीच सीधी टक्कर का मैदान बनी हुई है।
![]()
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पूर्वी चंपारण की ढाका सीट एक बार फिर सुर्खियों में है। नेपाल की सीमा से सटी यह विधानसभा सीट भौगोलिक और राजनीतिक, दोनों ही दृष्टि से बेहद अहम मानी जाती है। शिवहर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली यह सीट 11 नवंबर को दूसरे चरण में मतदान और 14 नवंबर को परिणामों के ऐलान के साथ राज्य के सियासी समीकरण तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है। कभी कांग्रेस का मजबूत गढ़ रही यह सीट 1990 के दशक में भाजपा के पवन जायसवाल के उभरने के साथ बदलती नजर आई। उसके बाद से यहां बीजेपी और राजद के बीच सीधी टक्कर का सिलसिला जारी है।
स्थानीय जनजीवन कृषि पर आधारित है — धान, मक्का और गन्ना यहां की मुख्य फसलें हैं। लेकिन सीमावर्ती इलाकों की तरह यहां पलायन, बाढ़ और सिंचाई की समस्या, साथ ही सीमा सुरक्षा और अवैध गतिविधियों की चुनौतियां भी गहराई से जुड़ी हैं। ढाका का राजनीतिक इतिहास उतना ही दिलचस्प है जितना इसका नाम — जो बंगाल से जुड़ी लोककथाओं और व्यापारिक प्रभावों से उत्पन्न बताया जाता है।
1952 से 1985 तक कांग्रेस ने यहां छह बार जीत दर्ज की, लेकिन 1990 के बाद से बीजेपी और राजद के बीच सत्ता की अदला-बदली होती रही। 2020 में भाजपा के पवन जायसवाल ने राजद के फैसल रहमान को मात दी थी, और अब 2025 में दोनों एक बार फिर आमने-सामने हैं। ढाका के मतदाता, जो ज्यादातर ग्रामीण हैं, इस बार फिर यह तय करेंगे कि सीमा से सटा यह कस्बा किसके हाथों में अपना राजनीतिक भविष्य सौंपेगा।






