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राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने जय नारायण व्यास यूनिवर्सिटी द्वारा एक सहायक प्रोफेसर को नौकरी से टर्मिनेट करने के आदेश को सही ठहराया है। जस्टिस रेखा बोराणा ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में प्रीति कल्ला की याचिका खारिज करते हुए कहा कि स्टडी लीव खत्म होने के बाद लगातार तीन साल तक ड्यूटी पर नहीं लौटना जानबूझकर गैरहाजिरी और नौकरी छोड़ना है। इसलिए नौकरी खत्म करने का निर्णय सही है।
दरअसल, जोधपुर के न्यू पावर हाउस रोड क्षेत्र निवासी प्रीति कल्ला को 14 फरवरी 1992 को जेएनवीयू में पार्ट टाइम टीचर के रूप में रखा गया था। बाद में रेगुलर भर्ती में उनका चयन हुआ और 12 अगस्त 1999 को इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन की सहायक प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति मिली। उसके बाद 28 अगस्त 2000 को उन्हें इस पद पर परमानेंट कर दिया गया।
साल 2002 में कल्ला ने एम.ई. करने के लिए स्टडी लीव के लिए आवेदन किया। तब 22 अक्टूबर 2002 को एक साल के लिए मंजूरी दी गई। कोर्स पूरा नहीं होने पर स्टडी लीव एक साल और बढ़ाई गई, यानी 8 नवंबर 2004 तक। याचिकाकर्ता कल्ला ने स्टडी लीव के लिए नियमानुसार बॉन्ड भी जमा किया था। इसके बाद उन्होंने तय समय में एम.ई. की डिग्री पूरी कर ली, लेकिन पीएचडी करने के बहाने ड्यूटी पर नहीं लौटी।
विवि ने भेजा नोटिस: 10 दिन में ज्वाइन करें ड्यूटी
जुलाई 2005 को विवि रजिस्ट्रार ने पत्र भेजकर 10 दिन में ड्यूटी ज्वाइन करने को कहा, नहीं तो इसे जानबूझकर गैरहाजिरी मान कार्रवाई की जाएगी। इसके जवाब में वाइस चांसलर से पीएचडी पूरी करने के लिए 3 साल की असाधारण छुट्टी (Without Pay Leave) मांगी।
तब, 10 नवंबर 2006 को फिर पत्र भेज कहा गया कि स्टडी लीव खत्म होने के बावजूद ड्यूटी ज्वाइन नहीं की गई है। 10 दिन में ड्यूटी ज्वाइन करें। जवाब में फिर स्टडी लीव बढ़ाने की मांग की।
तीसरे नोटिस में टर्मिनेशन की चेतावनी, दिया अंतिम अवसर
26 अप्रैल 2007 को विवि ने सूचित किया कि लीव बढ़ाने की रिक्वेस्ट 11 मार्च 2007 के सिंडिकेट रेजोल्यूशन अनुसार रिजेक्ट कर दी गई है। इस नोटिस के एक महीने में ड्यूटी ज्वाइन नहीं करने पर विवि नियमानुसार नौकरी खत्म कर दी जाएगी। आखिरकार 30 जुलाई 2007 को नौकरी खत्म कर दी गई। इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
कोर्ट में तर्क: रेजोल्यूशन में टर्मिनेशन निर्देश नहीं था
- कल्ला के वकील आर.एस. सलूजा और अचराज सलूजा ने तर्क दिया कि सिंडिकेट रेजोल्यूशन में टर्मिनेशन का निर्देश नहीं था। नौकरी खत्म करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया नहीं अपनाई गई।
- यदि स्टडी लीव नहीं बढ़ाई जा सकती, तो कम से कम असाधारण छुट्टी तो मिलनी चाहिए थी। गैरहाजिरी को असाधारण छुट्टी में बदला जा सकता था।
- याचिकाकर्ता ने भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा कि डॉ. जी.के. जोशी को समान स्थिति में स्टडी लीव खत्म होने के बाद असाधारण छुट्टी में बदलने की इजाजत मिली थी।
जेएनवीयू का तर्क: असाधारण छुट्टी के लिए जरूरी सेवा अवधि पूरी नहीं
- विवि के वकील पी.आर. सिंह जोधा ने तर्क दिया कि स्टडी लीव खत्म होने के बाद ड्यूटी ज्वाइन करना जरूरी था। कल्ला ने पीएचडी के लिए कभी फॉर्मल आवेदन नहीं किया, केवल लीव बढ़ाने की रिक्वेस्ट की।
- नियमों में एक कोर्स के लिए मिली स्टडी लीव को दूसरे कोर्स के लिए बढ़ाने का कोई प्रावधान नहीं है। याचिकाकर्ता असाधारण छुट्टी के लिए जरूरी सेवा के साल भी पूरे नहीं कर पाई थी।
- नियमानुसार पूरी नौकरी में कुल 3 साल की स्टडी लीव मिल सकती है और याचिकाकर्ता 2 साल ले चुकी थी। उन्हें स्पष्ट बताया गया कि लीव बढ़ाने की रिक्वेस्ट रिजेक्ट हुई है। फिर भी उन्होंने ड्यूटी ज्वाइन नहीं की, इसलिए यह जानबूझकर गैरहाजिरी है।

हाईकोर्ट ने किया विवि नियमों का विश्लेषण
कोर्ट ने यूनिवर्सिटी के नियमों का विश्लेषण किया। इनमें मुख्य रूप से स्टडी लीव और असाधारण छुट्टी के नियमों पर भी गौर किया गया। इनमें 2 जनवरी 1995 की अधिसूचना के अनुसार असाधारण छुट्टी के लिए गाइडलाइन बनाई गई थी। केवल वे परमानेंट कर्मचारी, जिन्होंने यूनिवर्सिटी में 5 साल की नौकरी पूरी की हो, असाधारण छुट्टी के लिए योग्य हैं। 5 साल तक कुछ नहीं, 5 से 10 साल तक 1 साल, 10 से 15 साल तक 3 साल और 15 साल के बाद 5 साल की असाधारण छुट्टी मिल सकती है।
हाईकोर्ट का निष्कर्ष: जानबूझ कर गैरहाजिर रहना यानी नौकरी छोड़ना
- कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने पीएचडी के लिए कभी तय फॉर्मेट में आवेदन नहीं किया। याचिकाकर्ता पहले ही 2 साल की स्टडी लीव ले चुकी थी और ज्यादा से ज्यादा 3 साल की सीमा होने के कारण 3 साल और नहीं मिल सकते थे।
- वर्ष 2004 में भी याचिकाकर्ता ने 5 साल की नौकरी पूरी नहीं की थी, इसलिए असाधारण छुट्टी के लिए योग्य नहीं थी। यदि यह मान भी लें कि याचिकाकर्ता 5-10 साल के बीच की नौकरी में थी, तो भी केवल 1 साल की असाधारण छुट्टी मिल सकती थी, 3 साल की नहीं।
- कोर्ट ने साफ कहा कि याचिकाकर्ता न तो स्टडी लीव बढ़ाने के लिए हकदार थी और न ही उस समय असाधारण छुट्टी में बदलने के लिए।
- कोर्ट ने नोट किया कि स्टडी लीव नवंबर 2004 में खत्म हो गई थी, लेकिन याचिकाकर्ता ने वर्ष 2007 तक ड्यूटी ज्वाइन नहीं की। याचिकाकर्ता ने पीएचडी भी पूरी नहीं की। तीन बार ड्यूटी ज्वाइन करने के लिए कहा गया लेकिन याचिकाकर्ता ने कोई ध्यान नहीं दिया।
- कोर्ट ने कहा कि यह साफतौर पर गलत काम है जो न केवल जानबूझकर गैरहाजिरी है बल्कि नौकरी छोड़ना भी है।
कोर्ट ने कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता न तो स्टडी लीव बढ़ाने के लिए हकदार थी और न असाधारण छुट्टी के लिए, इसलिए जांच करना निश्चित रूप से बेकार की कोशिश होती। जस्टिस बोराणा ने कहा कि 30 जुलाई 2007 के नौकरी खत्म करने के आदेश में दखल देने का कोई आधार नहीं है, इसलिए याचिका खारिज की जाती है।






