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सऊदी अरब ने हाल के समय में तुर्की के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। माना जा रहा है कि यह नई साझेदारी क्षेत्रीय संतुलन बनाने और खासकर इजरायल व यूएई के प्रभाव को सीमित करने की रणनीति का हिस्सा है। हालांकि इस बढ़ती नजदीकी से अमेरिका संतुष्ट नहीं दिख रहा है और उसे इससे असहजता है।
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रियाद की बदलती रक्षा रणनीति ने वॉशिंगटन की चिंता बढ़ा दी है। हाल के महीनों में सऊदी अरब ने पाकिस्तान और तुर्की के साथ अपने रक्षा संबंधों को तेज़ी से मजबूत किया है। खास तौर पर तुर्की के पांचवीं पीढ़ी के KAAN फाइटर जेट कार्यक्रम में उसकी दिलचस्पी को अमेरिका गंभीरता से देख रहा है। अमेरिका लंबे समय से सऊदी अरब का प्रमुख हथियार आपूर्तिकर्ता रहा है और वह चाहता है कि रियाद उसके F-35, F-15 जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमान खरीदे, न कि तुर्की या किसी अन्य देश की ओर रुख करे।
रिपोर्टों के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के अधिकारी इस संभावित डील को अमेरिकी हथियार बाजार के लिए खतरे के रूप में देख रहे हैं। बीते साल व्हाइट हाउस में क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाकात के दौरान अमेरिका ने सऊदी को F-35 बेचने की इच्छा जताई थी। इसी बीच जब पाकिस्तान के JF-17 जेट खरीदने की चर्चा सामने आई, तो वॉशिंगटन ने आपत्ति जताई। इसके बाद सऊदी अरब ने अमेरिका को भरोसा दिलाया कि वह पाकिस्तान से JF-17 नहीं खरीदेगा।
हालांकि, तुर्की के KAAN जेट को लेकर अमेरिका को अब तक कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है। अमेरिकी अधिकारी सऊदी को समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि अमेरिकी विमान तकनीकी रूप से अधिक विश्वसनीय और बेहतर विकल्प हैं। इसके बावजूद रियाद ने अपने रुख में बदलाव के संकेत नहीं दिए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब अमेरिका से दूरी बनाने की बजाय अपने विकल्प बढ़ा रहा है। उसका उद्देश्य रणनीतिक संतुलन बनाना, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाना और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में अपनी स्थिति मजबूत करना है। यूएई और इजरायल के साथ बढ़ते क्षेत्रीय समीकरणों के बीच सऊदी अपने लिए बहु-विकल्पीय रक्षा ढांचा तैयार करना चाहता है।
कुल मिलाकर, यह घटनाक्रम अमेरिका-सऊदी संबंधों में किसी तत्काल दरार का संकेत नहीं देता, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि रियाद अब केवल एक ही देश पर निर्भर रहने के बजाय बहु-ध्रुवीय रक्षा नीति अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।






