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“भारत-रूस शिखर वार्ता ने दुनिया का ध्यान खींचा है। बैठक में दोनों देशों ने रक्षा, परमाणु ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती देने का फैसला किया। संदेश साफ है—नई नीतियाँ किसी बाहरी दबाव नहीं, बल्कि आपसी भरोसे और साझा हितों पर आधारित हैं।”
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“भारत और रूस के बीच हुई 23वीं सालाना शिखर बैठक ने वैश्विक शक्तियों—अमेरिका, चीन और यूरोप—का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अमेरिका की चेतावनी के बावजूद भारत ने स्पष्ट कर दिया कि उसकी विदेश नीति किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों से संचालित होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बैठक में रक्षा, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, प्रौद्योगिकी और संवेदनशील रणनीतिक क्षेत्रों में अभूतपूर्व विस्तार का निर्णय किया गया। मोदी द्वारा भारत-रूस दोस्ती को ‘ध्रुवतारा’ कहना इस रिश्ते की स्थिरता और दीर्घकालिक महत्व को रेखांकित करता है।
रूस द्वारा भारत को S-400 जैसी उन्नत रक्षा प्रणालियाँ देने और फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइल के निर्यात को मंजूरी देने से यह भी संदेश गया कि मास्को भारत की सामरिक शक्ति बढ़ाने में किसी तीसरे देश—यहाँ तक कि चीन—की नाराज़गी की परवाह नहीं करता। दक्षिण चीन सागर में बढ़ते तनाव के बीच रूस का यह कदम चीन पर एक अप्रत्यक्ष दबाव की तरह देखा जा रहा है।
दूसरी तरफ, रूस-भारत संबंध एक नए वैश्विक ध्रुव के उभरने की संभावना को भी मजबूत कर रहे हैं। जब अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप चीन के साथ मिलकर दुनिया को दो हिस्सों में बांटने वाली ‘2G’ दुनिया की बात कर रहे हैं, तब रूस और भारत का बहुध्रुवीय व्यवस्था का समर्थन दुनिया के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। रूस खुद को अब भी महाशक्ति मानता है और अमेरिका-चीन द्वारा तय किसी शक्ति-संतुलन को स्वीकार करने के मूड में नहीं है।
अमेरिका और यूरोप पर रूस की दबाव क्षमता भी इस समय चरम पर है। यूक्रेन युद्ध और नैटो विस्तार पर रूस की शर्तों को मानने के लिए ट्रंप की मजबूरी यह दिखाती है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तेजी से बदल रही है। अगर रूस पर प्रतिबंध हटते हैं, तो भारत के लिए व्यापार और रक्षा सौदों को और गति मिलेगी। यह समीकरण भारत के हितों को बेहद अनुकूल माहौल दे सकता है—चीन को संतुलित करने के लिए भी और रूस के साथ सामरिक गहराई बढ़ाने के लिए भी।
पश्चिमी देशों में भी यह चिंता बढ़ रही है कि अगर चीन को खुली छूट मिली तो उसका ‘मिडल किंगडम’ वाला साम्राज्यवादी विज़न ताइवान, दक्षिण चीन सागर और व्यापारिक मार्गों पर उसकी पकड़ और मजबूत कर देगा। ऐसे में भारत-रूस का करीबी होना एक ऐसा विकल्प तैयार करता है जो न सिर्फ अमेरिका-चीन की ध्रुवीय राजनीति को चुनौती देता है, बल्कि एशिया में शक्ति-संतुलन के लिए भी अहम है।
इन परिस्थितियों में भारत और रूस की साझेदारी महज़ द्विपक्षीय संबंध नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति में एक नए ध्रुव के आकार लेने का संकेत है—जो बहुध्रुवीय दुनिया को स्थिरता देगा और चीन के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है






