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एयरलाइन पायलट्स असोसिएशन ऑफ इंडिया (ALPA) और FIP ने सरकार द्वारा दी गई राहत को यात्रियों की सुरक्षा के लिए जोखिम बताया है। दोनों संगठनों का आरोप है कि इंडिगो ने जानबूझकर ऐसा माहौल बनाया, जिससे सरकार पर दबाव बढ़े और नए नियमों में ढील मिल सके। उनका कहना है कि इंडिगो के ऑडिट के बाद वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।
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इंडिगो संकट को लेकर देश के दो बड़े पायलट संगठनों—एयरलाइन पायलट्स असोसिएशन ऑफ इंडिया (ALPA) और फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स (FIP)—ने सरकार द्वारा एयरलाइन को दी गई छूट का तीखा विरोध किया है। दोनों संस्थाओं का आरोप है कि नए नियम 1 नवंबर से लागू होने के बावजूद दिसंबर में अचानक संकट पैदा होना कई सवाल खड़े करता है। उनका मानना है कि इंडिगो ने जानबूझकर यह स्थिति बनाई ताकि सरकार पर दबाव बने और नए नियमों को या तो रोका जाए या उनमें ढील दी जाए, जिससे एयरलाइन की परिचालन लागत कम रहे।
ALPA ने इस मामले में DGCA को औपचारिक पत्र भेजकर कहा है कि सरकार द्वारा इंडिगो को दिए गए “चुनिंदा फायदे” न केवल अनुचित हैं, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा से भी सीधा समझौता करते हैं। ALPA के अध्यक्ष कैप्टन सैम थॉमस ने बताया कि नवंबर तक इंडिगो की उड़ानें सामान्य रूप से संचालित हो रही थीं और एयरलाइन ने विंटर शेड्यूल में अपनी फ्लाइट क्षमता 6% तक बढ़ा भी दी थी। ऐसे में दिसंबर में अचानक तकनीकी और ऑपरेशनल क्राइसिस का आना बेहद असामान्य है। FIP के अध्यक्ष चरणवीर रंधावा ने भी इसे इंडिगो की “सोची-समझी रणनीति” बताते हुए कहा कि इतनी बड़ी एयरलाइन नए नियमों के तहत अधिक पायलट और स्टाफ रखने से बचने के लिए इस तरह का दबाव बना सकती है।
इंडिगो के खिलाफ उठ रहे सवालों में इसकी ‘मोनॉपॉली’ भी एक बड़ा कारण है। भारत के घरेलू विमानन बाजार में कंपनी की हिस्सेदारी लगभग 64% है, जो इसे बाकी एयरलाइंस से कई कदम आगे खड़ा करती है। संसद में भी इस मुद्दे की गूंज सुनाई दी और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि यह संकट सरकार के “मोनॉपॉली मॉडल” का सीधा नतीजा है, जिसमें एक बड़ी कंपनी के हितों को प्राथमिकता दी जाती है।
एविएशन विशेषज्ञों का कहना है कि इस पूरी घटना ने भारत के विमानन क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय साख पर भी असर डाला है। उनके अनुसार, जिस तरह DGCA ने नए नियमों पर पीछे हटते हुए इंडिगो को राहत दी, उससे यह संदेश गया है कि भारतीय नियामक बड़ी कंपनियों के दबाव में काम कर सकते हैं। एविएशन सेफ्टी फर्म “मार्टिन कंसल्टिंग” के CEO मार्क डी. मार्टिन ने कहा कि एकाधिकार की स्थिति और नियामक की कमजोरी मिलकर पूरे उद्योग की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाती है।
विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यह विवाद केवल एक एयरलाइन का नहीं है; इससे भारत के विमानन तंत्र की निष्पक्षता, पारदर्शिता और सुरक्षा मानकों पर भी सवाल उठ खड़े हुए हैं।






