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पाकिस्तान, जो अब तक इजरायल को एक देश के रूप में मान्यता नहीं देता, अब गाजा में 20,000 जवान भेजने की घोषणा के बाद चर्चा में है। यह वही देश है जहां कुछ हफ्ते पहले ही इजरायल-हमास युद्धविराम को लेकर हिंसक प्रदर्शन हुए थे और सैकड़ों लोग मारे गए थे। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर पाकिस्तान ने अचानक ऐसा रुख क्यों अपनाया? क्या यह इजरायल को मान्यता देने की दिशा में एक संकेत है, या फिर किसी राजनीतिक दबाव का नतीजा? विशेषज्ञ मानते हैं कि यह फैसला मुस्लिम उम्माह और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच संतुलन बनाने की कोशिश हो सकता है।

पाकिस्तान के रुख में अचानक आए इस बदलाव ने पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चौंका दिया है। जिस देश ने अब तक इजरायल को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं दी, और जो दशकों से फिलिस्तीन और हमास का खुलकर समर्थन करता आया है, वही पाकिस्तान अब गाजा में हमास के खिलाफ कार्रवाई के लिए अपने सैनिक भेजने की तैयारी कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने पाकिस्तान से कम से कम 20,000 जवानों को गाजा भेजने का अनुरोध किया है। इन जवानों को गाजा में “हमास से हथियार छीनने” और वहां के उग्रवादी गुटों को निष्क्रिय करने की जिम्मेदारी दी जाएगी।
खुफिया सूत्रों के अनुसार, यह फैसला पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर की मिस्र यात्रा के दौरान लिया गया था। इस यात्रा में उनकी मुलाकात अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA और इजरायली एजेंसी मोसाद के वरिष्ठ अधिकारियों से हुई थी। बताया जा रहा है कि इसी मीटिंग के दौरान गाजा में पाकिस्तानी सैनिकों की सीमित तैनाती पर सहमति बनी, जिसका उद्देश्य “मानवीय पुनर्वास और पुनर्निर्माण” की आड़ में एक “नियंत्रित सैन्य उपस्थिति” कायम करना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम के पीछे पाकिस्तान के आर्थिक हित भी जुड़े हुए हैं। अमेरिका और इजरायल की ओर से पाकिस्तान को एक बड़े आर्थिक पैकेज का वादा किया गया है, जिसमें विश्व बैंक ऋण में रियायतें, पुनर्भुगतान कार्यक्रमों में राहत और खाड़ी देशों की ओर से वित्तीय सहायता शामिल है। बताया जा रहा है कि इजरायल और अमेरिका पाकिस्तान के सहयोग को एक “राजनयिक सौदे” के रूप में देख रहे हैं, जिसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर “चुपचाप पुरस्कृत” किया जाएगा।
एक और अहम संकेत पाकिस्तान के नए पासपोर्ट डिज़ाइन से मिला है। खुफिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि पाकिस्तान ने अपने नए पासपोर्ट से “इजरायल के लिए मान्य नहीं” वाली पंक्ति हटा दी है — जो तेल अवीव के प्रति उसके रुख में नरमी का स्पष्ट संकेत है। इस कदम को कई विशेषज्ञ इजरायल को धीरे-धीरे राजनयिक रूप से मान्यता देने की दिशा में उठाया गया पहला कदम मान रहे हैं।
हालांकि, इस फैसले से पाकिस्तान के भीतर और इस्लामी दुनिया में भारी असंतोष की संभावना है। पिछले महीने ही पाकिस्तान में इजरायल-हमास युद्धविराम के विरोध में भड़की हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए थे। ऐसे में पाकिस्तान का यह यू-टर्न कई सवाल खड़े करता है — क्या यह अमेरिका और पश्चिमी देशों के दबाव में लिया गया फैसला है? या फिर पाकिस्तान आर्थिक संकट से उबरने के लिए भू-राजनीतिक सौदेबाजी की राह पर चल पड़ा है?
इजरायली मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान की संभावित भागीदारी को “नाजुक लेकिन रणनीतिक रूप से उपयोगी” बताया गया है। वहीं, क्षेत्रीय ताकतों—खासकर ईरान, तुर्की और सऊदी अरब—में इस कदम को लेकर बेचैनी बढ़ गई है। यह कदम न केवल पाकिस्तान की विदेश नीति में ऐतिहासिक बदलाव का प्रतीक है, बल्कि यह दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व के शक्ति समीकरणों को भी पूरी तरह से बदल सकता है।






