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2001 की एक सर्द शाम। पटना के एक मशहूर डॉक्टर अपनी क्लिनिक से निकले, लेकिन घर नहीं पहुंच सके। रास्ते में ही उन्हें कार से खींचकर उठा लिया गया। अगले हफ्ते एक और सर्जन का अपहरण हो गया। फिर बेतिया, सिवान, मोतिहारी से डॉक्टर लापता होने लगे। सफेद कोट वालों में दहशत फैल गई। डॉक्टर बंदूक रखने लगे। गनर रखने लगे। ये वो दौर था, जब देश-विदेश के अखबारों में बिहार के लिए जंगल राज और अपहरण उद्योग जैसे मुहावरे गढ़े जाने लगे।
दैनिक भास्कर की इलेक्शन सीरीज ‘अपहरण’ के पहले एपिसोड में आज कहानी 4 डॉक्टरों के किडनैपिंग कांड की…
पहली कहानी : डॉक्टर ओझा हमारे पास हैं, एक करोड़ रुपए लाओ वरना जान से मार देंगे
बात 24 सितंबर 2001 की है। रात करीब 9 बजे का वक्त। जगह- बिहार की राजधानी पटना। बच्चों के जाने-माने डॉ. पूर्णेंदु ओझा अपने क्लिनिक से घर लौट रहे थे। अचानक उन्हें एहसास हुआ कि कोई उनका पीछा कर रहा है। उनकी सेंट्रो कार जैसे ही कंकड़बाग की एक संकरी गली में मुड़ी, सामने आकर सफेद कार खड़ी हो गई।
डॉ. पूर्णेंदु कुछ समझ पाते, तीन-चार नकाबपोश उस कार से निकले। हथियार लहराते हुए डॉ. की कार तक पहुंच गए। एक युवक ने चीखते हुए कहा- ‘@#@#$ निकल बाहर गाड़ी से। खोल दरवाजा।’ डॉ. ने दरवाजा नहीं खोला तो एक लड़के ने बंदूक तान दी। बोला- ‘ज्यादा हीरो बनेगा तो खोपड़ी उड़ा देंगे तुम्हारी।’
डरते हुए डॉ. ने जैसे ही दरवाजा खोला बदमाशों ने उन्हें दबोच लिया। कार से बाहर खींचा, आंखों पर कपड़ा बांधा और अपनी कार में बैठा लिया। सफेद बोलेरो कार तेजी से चल पड़ी।
अब तक रात के 10 बज चुके थे। डॉ. ओझा के घर वाले परेशान थे। बार-बार घर के बाहर निकलकर देख रहे थे कि अब तक वे लौटे क्यों नहीं। डॉ. का ड्राइवर भी फोन नहीं उठा रहा था। रात करीब 11 बजे परिवार ने कंकड़बाग थाने में फोन करके बताया कि डॉक्टर का कुछ पता नहीं चल रहा है।

पुलिस ने फौरन डॉ. ओझा की तलाश शुरू कर दी। शुरुआती शक डॉक्टर के ड्राइवर उदय पासवान पर गया। पुलिस ने उसे फोन किया तो पता चला कि वह किसी रिश्तेदार के यहां आया हुआ है। पुलिस तुरंत वहां पहुंची और ड्राइवर को पकड़ लिया।
SI ने कड़क आवाज में पूछा- ‘बताओ डॉक्टर ओझा कहां हैं?’
डरते हुए ड्राइवर बोला- ‘साहब नहीं मालूम। उन्होंने घर जाने से पहले किसी को फोन किया था, लेकिन किसे, मुझे नहीं पता।’
SI ने चीखते हुए कहा- ‘तुम झूठ बोल रहो हो।’
नहीं, साहब झूठ नहीं बोल रहा।
‘अपना मोबाइल दिखाओ।’ एक हंटर लगाते हुए SI ने पूछा।
SI ने ड्राइवर के कॉल रिकॉर्ड्स खंगाले, लेकिन कुछ खास मिला नहीं। पुलिस ने ड्राइवर को साथ लेकर कई जगह छापेमारी की, लेकिन कहीं कोई सुराग नहीं मिला। रात भर पुलिस इधर-उधर तलाश करती रही।
25 सितंबर की सुबह SI का फोन बजा। किसी ने कहा- ‘साहब नालंदा जिले के हरनौत में एक लावारिस कार खड़ी है। लगता है ये उसी डॉक्टर की कार है।’
SI, 10-12 पुलिस वालों को लेकर हरनौत के लिए निकल पड़े। वहां पहुंचकर पुलिस ने गाड़ी बरामद की। फिर डॉक्टर के परिवार को फोन लगाया- ‘डॉक्टर साहब की गाड़ी मिल गई है। आप लोग थाने आ जाइए’।
डॉ. का परिवार तुरंत कंकड़बाग थाने पहुंच गया। अपहरण का मामला दर्ज हुआ। पुलिस कड़ी से कड़ी मिलाने में जुट गई।
इसी बीच दोपहर 12 बजे डॉ. की पत्नी का फोन बजा। उधर से आवाज आई- ‘डॉक्टर ओझा हमारे पास हैं। एक करोड़ रुपए लाओ, फिर छोड़ेंगे, वरना जान से मार देंगे।’
परिवार ने तुरंत पुलिस को इसकी जानकारी दी। पटना एसएसपी ओएन भास्कर ने एक स्पेशल पुलिस टीम बनाई। SP ने टीम से कहा, ‘सबसे पहले सीसीटीवी फुटेज खंगालो और उस गाड़ी का नंबर ट्रेस करो।’
पुलिस ने तुरंत पड़ताल शुरू की। सीसीटीवी फुटेज जुटाकर गाड़ी का नंबर ट्रेस किया, लेकिन किडनैपर्स का कोई सुराग नहीं मिला।
इसी बीच 26 सितंबर को खबर आई कि दरभंगा से भी एक डॉक्टर कृष्ण मोहन वर्मा का अपहरण हो गया है। सरकार पर दबाव बढ़ चुका था। विपक्ष ‘जंगल राज’ कहकर सरकार को घेर रहा था। इसी बीच पटना हाईकोर्ट ने भी बिहार पुलिस को कड़ी फटकार लगा दी।
28 सितंबर को दिन में अचानक खबर आई कि डॉक्टर ओझा ऑटो में बैठकर घर पहुंच गए हैं। परिवार ने तुरंत पुलिस को इसकी जानकारी दी। पुलिस, डॉक्टर ओझा के घर पहुंची। डॉ. ठीक-ठाक हालत में थे। उनके साथ मारपीट नहीं हुई थी।
डॉ. घर कैसे लौटे, फिरौती दी गई या नहीं… इस पर न तो पुलिस ने कुछ कहा, न परिवार ने। दबे जुबान लोग यह चर्चा जरूर करते रहे कि डॉ. साहब फिरौती पर छूटे हैं। कुछ दिनों बाद दरभंगा के डॉ. वर्मा भी घर पहुंच गए। कहा गया कि वे भी फिरौती देकर छूटे हैं

इस घटना के बाद डॉ. ओझा तनाव में रहने लगे थे। दो साल बाद यानी 2003 में उन्होंने एक रिपोर्टर से कहा था- ‘अब मैं किसी पर भरोसा नहीं करता। परिवार के लोग घर से बाहर नहीं निकलते। बच्चों को विदेश भेज दिया है। हर दिन शाम 7 बजते ही क्लिनिक बंद कर देता हूं।’
मार्च 2003 में अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ ने लिखा- ‘बिहार में हर महीने बड़ी संख्या में डॉक्टरों, बिजनेसमैन और यहां तक कि गरीब किसानों का अपहरण हो जाता है। जबरन वसूली का धंधा चल रहा है। डॉक्टर विदेश भाग रहे हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने तो डॉक्टरों को बंदूक रखने की सलाह दे दी है।’
दूसरी कहानी : आधी रात डॉक्टर का अपहरण, एक करोड़ की फिरोती मांगी
18 मई, 2003, रात करीब 10.30 बजे का वक्त। पटना के जाने-माने न्यूरो सर्जन डॉ. रमेश चंद्र एक पार्टी से डिनर करके लौट रहे थे। उस दिन उनका ड्राइवर साथ नहीं था, तो वो खुद ही अपनी कार चला रहे थे।
रात 10:45 पर, जैसे ही उनकी गाड़ी सरपेंटाइन रोड के पंच मंदिर के पास पहुंची, एक बाइक सामने आकर खड़ी हो गई। डॉक्टर कुछ समझ नहीं पाए। उन्होंने कार का गेट खोलकर आवाज लगाई- ‘अब कौन हो तुम लोग, गाड़ी हटाओ सामने से।’
मुंह बांधे दो बदमाश तेजी से कार की तरफ बढ़े और डॉक्टर को दबोच लिया। उन्हें सड़क पर घसीटते हुए ले जाने लगे। तभी एक कार आकर वहां रुकी। बदमाशों ने जबरन डॉक्टर को उस कार में बैठाया और तेजी से निकल पड़े। डॉक्टर की कार वहीं सड़क किनारे लावारिस पड़ी रही।
अब तक रात के 11 बजे चुके थे। डॉ. का परिवार परेशान था। पत्नी ने फोन किया, लेकिन उनका फोन बंद था। उसके बाद साथी डॉक्टरों को फोन किया। पर कोई खबर नहीं मिली। परिवार और रिश्तेदार पूरी रात इधर-उधर तलाश करते रहे, फोन करते रहे।
सुबह होते ही परिवार ने पुलिस को डॉक्टर के लापता होने की जानकारी दी। इसके बाद थानों में फोन की घंटियां बजने लगीं। कुछ देर बाद पता चला कि पटना न्यू बाईपास रोड के पास एक लावारिस कार खड़ी है। पुलिस तुरंत वहां पहुंची। पिछली सीट पर डॉक्टर का टूटा हुआ चश्मा पड़ा था।
जक्कनपुर पुलिस थाने में FIR दर्ज की गई। डीजीपी डीपी ओझा ने एक स्पेशल टीम बनाने का आदेश दिया और पटना के नौबतपुर थाने के इलाके को सील कर दिया गया। दोपहर तक पुलिस छापेमारी करती रही, लेकिन डॉक्टर का कुछ पता नहीं चला।
इसी बीच डॉक्टर की पत्नी का फोन बजा। उधर से आवाज आई- ‘डॉक्टर साहब हमारे पास हैं, इन्हें छुड़ाने के लिए एक करोड़ रुपए लगेंगे।
डॉक्टर की पत्नी ने तुरंत डीजीपी को इसकी जानकारी दी। डीजीपी इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की इमरजेंसी बैठक में थे। उन्होंने भरोसा दिलाते हुए कहा- ‘आप परेशान मत होइए, हम फिरौती की एक रकम दिए बिना…डॉक्टर को छुड़ाएंगे, उन्हें कुछ नहीं होगा।’
तीन दिन बीत गए थे। पुलिस लगातार अलग-अलग नंबरों को ट्रेस कर रही थी। इस बीच पुलिस को खबर मिली कि डॉक्टर को नौबतपुर थाना के चिरौरा गांव में बंधक बनाकर रखा गया है।
डीजीपी ओझा ने फौरन एक मीटिंग बुलाई। इसमें स्थानीय थाने की पुलिस और क्राइम ब्रांच की यूनिट शामिल थी। अगले दिन सुबह का अंधेरा अभी खत्म नहीं हुआ था कि पुलिस की गाड़ियां तेजी से चिरौरा की ओर चल पड़ीं और जल्द ही गांव को घेर लिया।
सुबह 6 बजे पुलिस एक घर तक पहुंची। दरवाजा खटखटाया, पर कोई जवाब नहीं मिलाा। एक पुलिस वाले ने ऊंची आवाज में कहा- ‘दरवाजा खोलो, वरना पूरे घर को जलाकर राख कर देंगे।’
उसके बाद दरवाजा खुला। कमरे में डॉक्टर रस्सियों से बंधे हुए थे। चेहरा पीला पड़ गया था, आंखों में गहरी थकान थी। पास दो लोग खड़े थे- मुन्ना सिंह और चित्तरंजन सिंह।
पुलिस डॉक्टर और आरोपियों को थाने लेकर आई। आरोपियों ने इस किडनैपिंग केस में एक जदयू विधायक का भी नाम लिया। नाम था सुनील पांडेय। पुलिस ने केस दर्ज करने के बाद पटना की स्थानीय अदालत में चार्जशीट पेश कर दी। 4 साल तक सुनवाई चली। 2007 में कोर्ट ने सुनील पांडेय और 5 आरोपियों को उम्रकैद और 50-50 हजार का जुर्माना लगाया।
आरोपियों ने पटना हाईकोर्ट में अपील की। 3 साल बाद 2010 में अदालत ने सबूतों के अभाव में सुनील पांडेय समेत 4 आरोपियों को बरी कर दिया, लेकिन मुन्ना सिंह और चित्तरंजन सिंह की सजा बरकरार रखी।






