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एनआईटी राउरकेला के शोधकर्ताओं ने पिप्पली में पाइपरलॉन्ग्यूमीन नामक प्राकृतिक कंपाउंड की पहचान की है, जो कोलन कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने में प्रभावी है।
नई दिल्ली: भारत में पारंपरिक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली पिप्पली (Long Pepper) अब बड़ी आंत के कैंसर के उपचार में नई उम्मीद बनकर उभर रही है। NIT राउरकेला के वैज्ञानिकों ने अपने ताज़ा शोध में पाया है कि पिप्पली में मौजूद प्राकृतिक तत्व पाइपरलॉन्ग्यूमीन (Piperlongumine), कोलन कैंसर की कोशिकाओं को नष्ट करने में प्रभावी भूमिका निभा सकता है। सबसे खास बात यह है कि यह कंपाउंड सिर्फ कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाता है और स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान नहीं पहुंचाता, जो इसे पारंपरिक कीमोथेरेपी से अधिक सुरक्षित बनाता है।
यह अध्ययन प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका ‘बायोफैक्टर्स’ में प्रकाशित हुआ है। रिसर्च टीम के प्रमुख, NIT राउरकेला के लाइफ साइंसेज विभाग के असोसिएट प्रोफेसर बीजेश कुमार बिस्वाल ने बताया कि प्रारंभिक परीक्षणों में पाइपरलॉन्ग्यूमीन ने कैंसर रोधी गुणों को मजबूती से प्रदर्शित किया है। कीमोथेरेपी से जहां कई गंभीर दुष्प्रभाव देखे जाते हैं, वहीं पिप्पली से प्राप्त यह प्राकृतिक तत्व कम साइड इफेक्ट्स के साथ अधिक प्रभावी विकल्प प्रदान कर सकता है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि कई बार कैंसर रोगियों पर कीमोथेरेपी का असर धीरे-धीरे कम हो जाता है, जिससे बीमारी गंभीर हो जाती है और मृत्यु का जोखिम बढ़ जाता है। ऐसे में पिप्पली आधारित कंपाउंड को एक वैकल्पिक या पूरक उपचार के रूप में विकसित करना कैंसर उपचार में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है। इसी कारण रिसर्च टीम अब अगले चरण में पाइपरलॉन्ग्यूमीन को ऑक्सालिप्लाटिन जैसी मौजूदा कीमोथेरेपी दवाओं के साथ उपयोग करने की संभावना की जांच कर रही है।
हालांकि अभी कैंसर उपचार के विकल्प सीमित हैं, लेकिन इस शोध ने प्राकृतिक तत्वों पर आधारित भविष्य की चिकित्सा पद्धतियों के लिए नए द्वार खोल दिए हैं, जिससे आने वाले समय में बड़ी आंत के कैंसर के मरीजों को अधिक सुरक्षित और प्रभावी उपचार मिल सकता है।
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