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डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर मध्य पूर्व में ऐतिहासिक कूटनीतिक समझौते को आगे बढ़ाने की कोशिश में हैं। उनकी कोशिश है कि सऊदी अरब और पाकिस्तान भी अब्राहम अकॉर्ड का हिस्सा बनें और इजरायल को औपचारिक रूप से मान्यता दें। इससे पहले 2018 में ट्रंप की पहल पर यूएई, बहरीन और मोरक्को ने इजरायल से संबंध सामान्य किए थे, जबकि 2025 में कजाखस्तान भी इस समझौते में शामिल हो चुका है। अब सबकी नजर सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पर है, जो इजरायल को मान्यता देने से पहले कई शर्तों पर अड़े हुए हैं।

सऊदी अरब और इजरायल के बीच संबंध सामान्य करने को लेकर एक बार फिर वैश्विक राजनीति में हलचल मच गई है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब्राहम अकॉर्ड (Abraham Accords) का दायरा बढ़ाकर इसे अपने दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि बनाना चाहते हैं। उन्होंने साफ संकेत दिए हैं कि उनका अगला लक्ष्य सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे प्रभावशाली मुस्लिम देशों को इस समझौते में शामिल कर इजरायल को मान्यता दिलवाना है। लेकिन, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (Mohammed bin Salman) इस पर अपने स्पष्ट और सख्त रुख के साथ खड़े हैं। उन्होंने संकेत दिया है कि जब तक फिलीस्तीन (Palestine) को स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देने और दो-राष्ट्र समाधान (Two-State Solution) पर ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक सऊदी अरब किसी भी सूरत में इजरायल को मान्यता नहीं देगा।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब ने अमेरिका को यह भी बता दिया है कि इजरायल के साथ किसी भी तरह के राजनयिक संबंध या समझौते पर हस्ताक्षर तभी होंगे, जब फिलीस्तीन के लिए रोडमैप पर सहमति बन जाएगी। रियाद नहीं चाहता कि बिना फिलीस्तीन के अधिकारों को सुरक्षित किए, सऊदी अरब ऐसे किसी कदम को उठाए जिससे अरब जगत में उसकी नेतृत्व छवि पर सवाल उठें। यह रुख सऊदी की क्षेत्रीय राजनीति और धार्मिक नेतृत्व की भूमिका को भी दर्शाता है।
मोहम्मद बिन सलमान का आगामी वाशिंगटन दौरा (White House Visit) इसी संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। यह दौरा इसलिए खास माना जा रहा है क्योंकि 2018 में पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या के बाद यह उनका पहला अमेरिका दौरा है। उस घटना ने सऊदी-अमेरिका रिश्तों को गहराई से प्रभावित किया था। तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन ने खुलकर मोहम्मद बिन सलमान को हत्या का जिम्मेदार ठहराया था। लेकिन ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के बाद स्थिति बदल रही है — दोनों नेताओं के बीच नजदीकियां बढ़ रही हैं और अब उम्मीद की जा रही है कि दोनों देश अपने रणनीतिक और आर्थिक रिश्तों को फिर से मजबूत दिशा में ले जाएंगे।
सऊदी अरब की रणनीति इस बार बेहद सोच-समझकर बनाई गई है। सूत्रों के मुताबिक, सऊदी अधिकारी नहीं चाहते कि व्हाइट हाउस में होने वाली चर्चाओं की शुरुआत इजरायल मुद्दे से हो। उनकी प्राथमिकता अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीकी सहयोग और निवेश समझौतों पर रहेगी। रियाद अमेरिका से अत्याधुनिक F-35 स्टील्थ फाइटर जेट और उन्नत हथियार प्रणालियों की खरीद पर चर्चा कर सकता है। इसके अलावा, सऊदी अमेरिका से संयुक्त सैन्य अभ्यास, साइबर सुरक्षा सहयोग और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की भी योजना बना रहा है।
कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि सऊदी अरब फिलहाल अमेरिका के साथ एक सीमित रक्षा समझौते (Limited Defense Pact) पर सहमति बनाने की कोशिश करेगा, जिसे भविष्य में पूर्ण सैन्य संधि में बदला जा सके। इस समझौते का मकसद ईरान जैसे क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों से निपटने की क्षमता को मजबूत करना और अमेरिकी सुरक्षा छत्र के तहत खुद को और सुरक्षित करना है।
इजरायल को मान्यता देने का सवाल, हालांकि, अभी भी सबसे पेचीदा मुद्दा बना हुआ है। अगर सऊदी अरब, दशकों की दुश्मनी के बाद इजरायल को मान्यता देता है, तो यह न सिर्फ मध्य पूर्व की राजनीति बल्कि पूरी वैश्विक कूटनीति के लिए ऐतिहासिक घटना साबित होगी। अरब जगत में सऊदी की धार्मिक और राजनीतिक अहमियत के कारण अन्य मुस्लिम देशों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा।
हालांकि मौजूदा स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि प्रिंस सलमान जल्दबाजी में कोई बड़ा फैसला नहीं लेंगे। वे चाहते हैं कि पहले अमेरिका और इजरायल, फिलीस्तीन के राज्य गठन को लेकर कोई ठोस प्रस्ताव पेश करें। सऊदी का मकसद स्पष्ट है — वह क्षेत्रीय शांति का समर्थन करता है, लेकिन फिलीस्तीन के अधिकारों की कीमत पर नहीं।
कुल मिलाकर, आने वाला वाशिंगटन दौरा न केवल सऊदी-अमेरिका संबंधों के लिए बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की राजनीति के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या डोनाल्ड ट्रंप, मोहम्मद बिन सलमान को इजरायल को मान्यता देने के लिए मना पाएंगे, या सऊदी अरब अपनी पारंपरिक कूटनीति और शर्तों पर कायम रहेगा।






