लिव-इन से शुरू हुआ प्यार, लेकिन अंत में बना खौफनाक वीडियो… कैसे एक-दूसरे के जानी दुश्मन बन गए प्रेमी जोड़े


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भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को समाज अब भी पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाया है। पहले यह रिश्ता प्यार और आज़ादी की पहचान माना जाता था, लेकिन हाल के कुछ मामलों ने इसकी तस्वीर बदल दी है। कई लिव-इन कपल्स के रिश्ते प्यार से नफरत और फिर हिंसा में बदलते देखे गए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्यों इन रिश्तों में भरोसे की जगह शक और गुस्सा हावी हो जाता है। आइए जानते हैं इस बदलते ट्रेंड के पीछे के कारण।

भारत में लिव-इन रिलेशनशिप एक समय तक समाज की नज़रों में वर्जित विषय माना जाता था, लेकिन अब शहरी जीवनशैली में यह धीरे-धीरे आम होता जा रहा है। हालांकि, हाल के दिनों में लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े कई ऐसे दर्दनाक और सनसनीखेज मामले सामने आए हैं, जिन्होंने इस रिश्ते के अर्थ और सुरक्षा पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन रिश्तों की नींव प्यार, समझ और स्वतंत्रता पर रखी जाती है, वे कैसे हिंसा, जलन, शक और मौत की दास्तान बन जाते हैं — यह अब एक गंभीर सामाजिक चिंता का विषय बन गया है।

दिल्ली, नोएडा, बेंगलुरु और मुंबई जैसे महानगरों में पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई केस सामने आए हैं जहां प्रेमी जोड़ों ने अपने ही पार्टनर की जान ले ली। नोएडा की अमृता चौहान और रमकेश मीणा का मामला हो या श्रद्धा वॉल्कर और आफताब पूनावाला का, हर कहानी के पीछे प्यार से ज़्यादा ‘कब्ज़ा’ और ‘कंट्रोल’ की मानसिकता दिखती है। अमृता केस में एक निजी वीडियो विवाद की वजह से हत्या हुई, वहीं श्रद्धा केस में शक और गुस्से ने रिश्ते को खौफनाक अंजाम दिया। बेंगलुरु की वनाजाक्षी को उसके साथी ने सरेआम पेट्रोल डालकर जला दिया, तो मुंबई में मनोज साने ने अपनी लिव-इन पार्टनर सरस्वती वैद्य के शव के टुकड़े कर प्रेशर कुकर में उबाल दिए — ये सभी घटनाएं बताती हैं कि आधुनिकता के इस रिश्ते में कहीं न कहीं भावनात्मक असंतुलन और असुरक्षा गहराई से मौजूद है।

विशेषज्ञों के अनुसार, लिव-इन रिलेशन में अपराधों की जड़ें मानसिक और सामाजिक स्तर पर छिपी हैं। मनोवैज्ञानिक विवेक दुबे का कहना है कि “जब रिश्ते में संवाद की जगह नियंत्रण ले लेता है, तो प्यार धीरे-धीरे हिंसा में बदल जाता है।” मैक्स अस्पताल की मनोवैज्ञानिक डॉ. दीपाली बत्रा कहती हैं कि यह केवल जुनून या गुस्से में किया गया अपराध नहीं होता, बल्कि यह “पावर और ओनरशिप” दिखाने का तरीका बन जाता है। साथी को एक स्वतंत्र इंसान की बजाय ‘अपनी संपत्ति’ समझने की सोच ही इस हिंसा को जन्म देती है।

दूसरी ओर, समाज और राजनीति में भी लिव-इन रिलेशनशिप पर लगातार बहस जारी है। कुछ नेताओं का मानना है कि यह भारतीय संस्कृति के खिलाफ है, जबकि कुछ इसे दो समझदार व्यक्तियों का व्यक्तिगत निर्णय बताते हैं। यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने लिव-इन से दूरी बनाने की चेतावनी दी थी, वहीं केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा था कि शादी से ही समाज का संतुलन बना रहता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर दो बालिग अपनी मर्जी से साथ रहते हैं, तो यह गैरकानूनी नहीं है।

इन घटनाओं और बहसों के बीच एक सवाल लगातार उठता है — क्या वाकई लिव-इन रिलेशनशिप में प्यार की जगह अब हिंसा ने ले ली है? या यह उन लोगों की कहानियां हैं, जो रिश्तों में बराबरी और सम्मान की परिभाषा को समझ नहीं पाए?
जो भी हो, इन घटनाओं ने यह तो साफ कर दिया है कि आधुनिक रिश्तों की यह आज़ादी तभी सुंदर है, जब उसके साथ भावनात्मक परिपक्वता और ज़िम्मेदारी भी जुड़ी हो।

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