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पूर्व सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ ने उमर खालिद जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा कि मुकदमे के बिना लंबे समय तक जेल में रखना संवैधानिक न्याय की मूल भावना को कमजोर करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि से पहले जमानत नागरिक का मौलिक अधिकार है और जहां शीघ्र सुनवाई संभव न हो, वहां जमानत को नियम माना जाना चाहिए, न कि अपवाद।
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🚨📰 पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ का बड़ा बयान
⚖️ उमर खालिद जैसे मामलों का हवाला, संवैधानिक न्याय पर जताई चिंता
नई दिल्ली/जयपुर:
दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद की जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट से खारिज होने के बाद अब इस मुद्दे पर डी.वाई. चंद्रचूड़ का अहम बयान सामने आया है। पूर्व सीजेआई ने कहा कि बिना मुकदमे के वर्षों तक किसी व्यक्ति को जेल में रखना संवैधानिक न्याय की मूल भावना को कमजोर करता है।
🏛️⚖️ “दोषसिद्धि से पहले जमानत नागरिक का अधिकार”
जयपुर में रविवार को आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए पूर्व सीजेआई ने कहा कि दोष सिद्ध होने से पहले जमानत प्राप्त करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले में शीघ्र सुनवाई संभव नहीं है, तो जमानत को अपवाद नहीं बल्कि नियम माना जाना चाहिए।
⏳🚔 पांच साल से जेल में बंद, फिर भी सुनवाई नहीं
उमर खालिद के मामले का उल्लेख करते हुए डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा—
“वे लगभग पांच साल से जेल में हैं। मैं अपने न्यायालय की आलोचना नहीं कर रहा हूं, लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि हर आरोपी को शीघ्र सुनवाई का अधिकार है। यदि मौजूदा हालात में त्वरित सुनवाई संभव नहीं है, तो जमानत नियम होनी चाहिए।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि अदालतें जमानत देते समय सख्त शर्तें लगा सकती हैं, ताकि उसका दुरुपयोग न हो।
🚫🔍 किन परिस्थितियों में जमानत से किया जा सकता है इनकार
पूर्व सीजेआई ने स्पष्ट किया कि कुछ विशेष परिस्थितियों में जमानत से इनकार किया जा सकता है, जैसे—
✔️ आरोपी के दोबारा अपराध करने की आशंका
✔️ सबूतों से छेड़छाड़ की संभावना
✔️ कानून से भागने का खतरा
उन्होंने कहा कि यदि ये तीनों आधार मौजूद नहीं हैं, तो जमानत दी जानी चाहिए।
🛡️🇮🇳 राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों पर संतुलन जरूरी
डीवाई चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि जहां राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे हों, वहां अदालतों का दायित्व और बढ़ जाता है। ऐसे मामलों में गहराई से जांच जरूरी है, लेकिन केवल सुरक्षा का हवाला देकर किसी व्यक्ति को वर्षों तक जेल में रखना न्यायसंगत नहीं है।
📊📜 21,000 जमानत याचिकाएं, सिस्टम पर दबाव
अपने कार्यकाल का जिक्र करते हुए पूर्व सीजेआई ने बताया कि
“मेरे 24 महीनों के कार्यकाल में हमने लगभग 21,000 जमानत याचिकाओं का निपटारा किया।”
उन्होंने कहा कि अक्सर सुप्रीम कोर्ट को जमानत न देने के लिए आलोचना झेलनी पड़ती है, लेकिन निचली अदालतों में जमानत न मिलने के कारण ही अधिकांश मामले शीर्ष अदालत तक पहुंचते हैं।
⚠️⏰ मामलों में देरी पर गंभीर चिंता
पूर्व सीजेआई ने भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में मामलों के निपटारे में हो रही देरी पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि संविधान सर्वोच्च है, और यदि त्वरित सुनवाई में देरी हो रही है तो आरोपी जमानत का अधिकारी बनता है।
साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सत्र और जिला अदालतों में जमानत न देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, क्योंकि न्यायाधीशों को अपनी निष्ठा पर सवाल उठने का डर सताता है।






