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China Economy Down: चीन की अर्थव्यवस्था इस समय गंभीर संकट का सामना कर रही है। देश में निवेश धीमा पड़ गया है और इसके साथ ही चीन का उत्पादन होने वाला सामान दुनिया के बाजारों में पूरी तरह बिक नहीं पा रहा है। न तो आंतरिक मांग मजबूत है और न ही निर्यात में सुधार दिख रहा है, जिससे आर्थिक गतिविधियां सुस्त हो गई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस स्थिति में चीन को आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए कठिन फैसलों और रणनीतिक उपायों की जरूरत है।

नई दिल्ली: चीन की अर्थव्यवस्था फिलहाल गंभीर संकट का सामना कर रही है और देश की आर्थिक ग्रोथ धीमी पड़ गई है। नवंबर में खुदरा बिक्री पिछले तीन साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई, केवल 1.3% बढ़ी, जबकि ब्लूमबर्ग ने 2.9% की वृद्धि का अनुमान लगाया था। यह कोविड-19 महामारी के बाद की सबसे धीमी रफ्तार मानी जा रही है और उम्मीदों से काफी कम रही। इस कमजोरी का असर न सिर्फ खुदरा बाजारों पर पड़ा है, बल्कि फैक्ट्री उत्पादन और निवेश में भी साफ दिखाई दे रहा है।
औद्योगिक उत्पादन में भी सुस्ती देखी गई। नवंबर में औद्योगिक उत्पादन सिर्फ 4.8% बढ़ा, जबकि रॉयटर्स के अनुमान के अनुसार यह 5% होना चाहिए था। अक्टूबर में यह आंकड़ा 4.9% था। निवेश पर भी दबाव बना हुआ है। खासकर प्रॉपर्टी और फिक्स्ड-एसेट इन्वेस्टमेंट में गिरावट के चलते साल के पहले 11 महीनों में कुल निवेश 2.6% घट गया। शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 5.1% पर स्थिर रही, जिससे यह स्पष्ट होता है कि लेबर मार्केट में कोई खास सुधार नहीं हुआ।
कार और ऑटो इंडस्ट्री में भी बिक्री में भारी गिरावट आई। नवंबर में सालाना आधार पर कार बिक्री 8.5% घट गई, जो पिछले 10 महीनों में सबसे बड़ी गिरावट है। आमतौर पर साल के अंतिम दो महीनों में ऑटो इंडस्ट्री की बिक्री बढ़ जाती है, लेकिन इस बार यह उम्मीद पूरी नहीं हुई। साल का सिंगल डे शॉपिंग फेस्टिवल पांच हफ्तों तक चला, लेकिन ग्राहकों को आकर्षित करने में सफलता नहीं मिली।
चीन के लिए घरेलू खपत को बढ़ाना अब एक बड़ी चुनौती बन गई है। देश की अर्थव्यवस्था अब बाहरी जोखिमों और विदेशी मांग पर अधिक संवेदनशील हो गई है। अमेरिकी टैरिफ वॉर और वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता चीन की आर्थिक गतिविधियों पर दबाव डाल रही है। देश के अंदर कमजोर मांग और निवेश की कमी ने महंगाई को कम किया है, जिससे न सिर्फ मुनाफा प्रभावित हुआ है बल्कि मजदूरी और वेतन पर भी असर पड़ा है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, हाल के आर्थिक रुझान भविष्य में और अधिक चुनौतियों की ओर संकेत कर रहे हैं। लोन ग्रोथ धीमी हो रही है और निवेश में अचानक गिरावट देखी गई है, जो अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।
चीन के पास अब विकल्प सीमित हैं। विदेशी बाजारों में अपने सामान की मांग कम होने के चलते देश अब घरेलू खपत बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। हाल ही में हुई हाई-लेवल इकोनॉमिक मीटिंग्स में चीन के नेताओं ने आने वाले साल के लिए घरेलू मांग को प्राथमिकता देने की योजना बनाई है। विदेशी व्यापार में अनिश्चितता को देखते हुए, घरेलू खपत पर भरोसा ही चीन की अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने का मुख्य रास्ता बन गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि चीन घरेलू निवेश और उपभोक्ता खर्च को सही दिशा में बढ़ाने में सफल नहीं होता है, तो आर्थिक सुस्ती और बेरोजगारी में वृद्धि के साथ देश की ग्रोथ पर लंबी अवधि में गंभीर असर पड़ सकता है।
इस समय चीन के लिए चुनौती यह है कि वह वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बनाए रखे और घरेलू खपत को बढ़ाकर आर्थिक संतुलन बनाए। इसके लिए सरकार को वित्तीय प्रोत्साहन, निवेश आकर्षित करने और रोजगार सृजन के उपाय करने होंगे। यदि यह नहीं हुआ, तो चीन की अर्थव्यवस्था न केवल धीमी ग्रोथ बल्कि वैश्विक आर्थिक जोखिमों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनी रहेगी।






