पाप-पुण्य का फल, जब महात्माजी की आत्मा ने सेठ के यहां पुत्र रूप में जन्म लेकर किया हिसाब बराबर


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Paap Aur Punya Ki Katha : वैदिक ग्रंथों के अनुसार, पाप-पुण्य का फल हमारे कर्मों से बने संस्कारों से मिलता है। पुनर्जन्म के कर्मों का आधार और पाप-पुण्य के हिसाब-किताब की ब्रह्माण्डीय नीति समझना अत्यन्त कठिन है। महात्माओं द्वारा कहे गए इस कथानक से समझ में आती है, ईश्वरीय न्याय व्यवस्था।

अक्सर लोग पूछते हैं, पाप-पुण्य का फल क्या और कब कैसे मिलता है। वैदिक ग्रंथ इस प्रश्न का उत्तर देते हैं, वे कहते हैं, ‘हे मानव! तुमने जो कुछ किया है और करते हो, उनसे जो संस्कार बनते हैं, वे ही पुण्य-पाप के रूप में तुम्हें प्राप्त होता है।’

महात्मा लोग एक कथानक कहते हैं, एक बहुत बड़े धनिक किसी महात्मा के भक्त थे, वे रोज उन महात्मा के दर्शन के लिए आते-जाते थे। महात्मा जी के अनेक भक्त थे, जिनसे उनको यदा-कदा भेंट-पूजा आदि में द्रव्य यानी धन की प्राप्ति होती रहती थी। धीरे-धीरे महात्मा जी के पास उस जमाने में लगभग एक लाख रुपए इकट्ठे हो गए। अपने प्रति सर्वाधिक श्रद्धा भक्ति दिखाने वाले उस धनिक पर विश्वास करके महात्मा जी ने एक लाख रुपए उसी के पास जमा कर दिए।

कुछ समय पश्चात महात्मा जी की इच्छा आश्रम बनवाने की हुई, इसलिए उन्होंने सेठ जी से अपने जमा रुपए मांगे। सेठ जी की नीयत बदल गई, वह कहने लगे, कैसे रुपए, कब दिए थे आपने। आप जैसे लंगोट पहनने वालों के पास एक लाख रुपए आया कहां से। इन अप्रत्याशित वचनों को सुनकर महात्मा जी के हृदय की गति बंद हो गई और तत्काल उनका प्राणान्त हो गया।

उधर सेठ जी की कोई संतान न थी, सेठ जी इस घटना को भूल गए। किन्तु ठीक दसवें महीने, उनके यहां एक पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र पैदा होते ही, खुशी में पैसा पानी की तरह बहाया जाने लगा। लड़के के लालन-पालन, खेल, खिलौने आदि में एक की जगह दस रुपए खर्च किया जाने लगा। ऐसे लाड़-प्यार में पला बालक बचपन से ही अधिक खर्चीला होता चला गया। युवावस्था में आते ही उसकी फिजूलखर्ची बढ़ती गई। प्रारम्भ में तो पिता ने अपने एक लौते बेटे की इस जीवनचर्या पर ध्यान नहीं दिया, परन्तु जैसे-जैसे समय बीतता गया, पिता की चिन्ता बढ़ती गई। फिर भी पिता ने कभी यह हिसाब लगाकर नहीं देखा, कि लड़का कितना खर्च कर चुका और कितना कर रहा है, सिलसिला जारी रहा।

एक बार लड़के ने बिना पिता की मर्जी के अपने दोस्तों को दावत पर बुलाया, जिसमें खूब पैसा खर्च किया गया। उसके बाद लड़के ने नौकर को भेजकर एक पान मंगवाया, पाने खाकर लड़का जो सोया तो वह कभी उठा ही नहीं। कुछ दिनों के बाद जब सेठ जी ने अपने मुनीम से दिवंगत बेटे द्वारा खर्च किए गए रुपयों के हिसाब-किताब का विवरण जाना, तो वे हैरान इस बात को लेकर हो गए कि बेटे ने आखिरी में पान मंगवाया था, उसकी कीमत को लेकर एक लाख रुपए की रकम बनी, तभी उसको महात्मा जी के एक लाख रुपए की बात स्मरण में आई और वह समझ गया कि महात्मा ही पुत्र के रूप में पैदा होकर अपना एक लाख रुपए का हिसाब-किताब बराबर करके चले गए।

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