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अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ (आयात शुल्क) को लेकर एक बार फिर बड़ा कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। इस मामले की सुनवाई आज बुधवार को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में होनी है। दिलचस्प बात यह है कि इस अहम केस को चुनौती देने वाले वकील हैं भारतवंशी अमेरिकी अटॉर्नी नील कात्याल, जो अमेरिका के पूर्व सॉलिसिटर जनरल रह चुके हैं और कई हाई-प्रोफाइल मामलों में सरकार का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
नील कात्याल का तर्क है कि ट्रंप प्रशासन ने राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर आयात पर अतिरिक्त टैरिफ लगाकर अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया था। उनका कहना है कि इस तरह के फैसलों से न केवल अमेरिकी उद्योग, बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। इस सुनवाई के नतीजे का असर न सिर्फ अमेरिका की व्यापार नीति पर पड़ेगा, बल्कि भारत समेत कई सहयोगी देशों के साथ उसके आर्थिक रिश्तों पर भी हो सकता है।
नील कात्याल भारतीय मूल के सबसे प्रभावशाली वकीलों में से एक हैं और अमेरिकी अदालतों में संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा के लिए उनकी मजबूत कानूनी दलीलों के लिए जाने जाते हैं। इस केस को ट्रंप युग की आर्थिक नीतियों पर एक महत्वपूर्ण परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है, जिसका असर आने वाले अमेरिकी चुनावी माहौल पर भी पड़ सकता है।
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अमेरिका में आज एक ऐसा मुकदमा सुर्खियों में है, जो न सिर्फ वहां की व्यापार नीति बल्कि राष्ट्रपति की संवैधानिक सीमाओं को भी परिभाषित कर सकता है। यह मामला है पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ (आयात शुल्क) का, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट में भारतीय मूल के नामी वकील नील कात्याल (Neal Katyal) चुनौती दे रहे हैं। यह मुकदमा अमेरिका के हाल के इतिहास के सबसे चर्चित संवैधानिक मामलों में से एक बन गया है।
नील कात्याल, जो अमेरिका के पूर्व सॉलिसिटर जनरल रह चुके हैं, ने सुप्रीम कोर्ट में अब तक 50 से अधिक मामलों में पैरवी की है और उन्हें अमेरिका के सबसे सफल वकीलों में गिना जाता है। वे ट्रंप प्रशासन की नीतियों के मुखर आलोचक रहे हैं और कई बार उन्होंने अमेरिकी लोकतंत्र की संस्थाओं की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस बार उनका मुकाबला सीधे ट्रंप की उस नीति से है, जिसके तहत उन्होंने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत आयात पर भारी-भरकम टैरिफ लगा दिए थे।
कात्याल का तर्क है कि ट्रंप ने इस कानून का गलत इस्तेमाल किया और राष्ट्रपति की शक्तियों का अति-विस्तार किया। उनका कहना है कि संविधान के मुताबिक, टैक्स या टैरिफ लगाने का अधिकार केवल अमेरिकी कांग्रेस के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं। इसलिए यह मामला सिर्फ आर्थिक नीति का नहीं बल्कि संविधान के अधिकार विभाजन (Separation of Powers) की परीक्षा है।
यह मुकदमा इतना महत्वपूर्ण है कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने इसे सुनने के लिए सामान्य 60 मिनट की जगह 80 मिनट की विशेष सुनवाई अवधि तय की है। कोर्टरूम में भारी भीड़ की उम्मीद है और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की नजरें इस सुनवाई पर टिकी हैं। ट्रंप ने खुद इस मामले को “अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे असरदार फैसला” बताया है। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर उनका पक्ष हार गया तो “अमेरिका तीसरी दुनिया के देश की तरह कमजोर पड़ जाएगा।”
दिलचस्प बात यह है कि नील कात्याल को इस केस की पैरवी का मौका एक कॉइन टॉस (सिक्का उछाल) के जरिए मिला। उनके साथ भारतीय-अमेरिकी वकील प्रतीक शाह भी इस कानूनी टीम का हिस्सा हैं। शाह ‘एकिन गंप’ लॉ फर्म में अपीलेट प्रैक्टिस के प्रमुख हैं और दो अमेरिकी खिलौना कंपनियों—‘लर्निंग रिसोर्सेज’ और ‘हैंड2माइंड’—का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इन कंपनियों का भी यही कहना है कि राष्ट्रपति ने IEEPA के तहत अपनी सीमाओं से अधिक शक्तियां इस्तेमाल कीं।
यह केस नील कात्याल के करियर का भी एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है। उन्होंने पहले अल गोर बनाम जॉर्ज बुश (Bush v. Gore) जैसे ऐतिहासिक मामले में भी हिस्सा लिया था और ट्रंप के मुस्लिम ट्रैवल बैन को चुनौती देने में अहम भूमिका निभाई थी। उनकी गिनती अमेरिका के उन कुछ वकीलों में होती है, जिन्होंने कानून को केवल तकनीकी ढंग से नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के साधन के रूप में इस्तेमाल किया है।
कात्याल की जड़ें भारत से जुड़ी हैं। उनका जन्म शिकागो (अमेरिका) में हुआ था, लेकिन उनके माता-पिता भारत से प्रवास कर वहां बसे थे। उनके पिता इंजीनियर और मां डॉक्टर थीं, जबकि उनकी बहन सोनिया कात्याल यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले में कानून की प्रोफेसर हैं। नील ने येल लॉ स्कूल से पढ़ाई की है और अपने शानदार कानूनी तर्कों के लिए जाने जाते हैं।
अगर सुप्रीम कोर्ट निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखता है, जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रपति ने टैरिफ लगाकर अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया है, तो यह फैसला अमेरिकी कार्यपालिका की शक्तियों को सीमित कर देगा। इसका असर न सिर्फ अमेरिकी कंपनियों बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था, खासकर भारत और चीन जैसे देशों के साथ अमेरिका के रिश्तों पर भी पड़ेगा। दूसरी ओर, अगर ट्रंप का पक्ष जीत जाता है, तो यह भविष्य के लिए एक बड़ा मिसाल बनेगा और किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति को व्यापक आर्थिक और व्यापारिक फैसले लेने की आजादी मिल सकती है — बिना कांग्रेस की अनुमति के।
इस सुनवाई का असर राजनीतिक तौर पर भी देखा जा रहा है, क्योंकि अमेरिका में चुनावी माहौल बनना शुरू हो गया है। ट्रंप इसे अपनी नीतियों की “वैधता की लड़ाई” बता रहे हैं, जबकि कात्याल इसे “संविधान और लोकतंत्र की रक्षा” का मामला मानते हैं। आने वाले हफ्तों में सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि क्या अमेरिका में राष्ट्रपति सर्वोच्च है या संविधान सर्वोच्च।






