तालिबान की धमकी के बाद हिला पाकिस्तान: इस्लामाबाद में मची हलचल, भारत को लेकर भड़के रक्षा मंत्री


Loading

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के आक्रामक बयानों के बीच हालात अचानक बदल गए हैं। पहले वार्ता से हटने वाला पाकिस्तान अब फिर से बातचीत की मेज पर लौट आया है। टोलो न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान के सूत्रों ने बताया कि इस्तांबुल में मौजूद पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल, जो वापसी की तैयारी में था, उसे बातचीत जारी रखने के लिए फिर से शामिल कर लिया गया है। तालिबान की कड़ी चेतावनी के बाद पाकिस्तान के इस कदम को बड़ी रणनीतिक पलटी माना जा रहा है।

पाकिस्तान और तालिबान के बीच बढ़ते तनाव ने अब एक बार फिर पूरे क्षेत्र में हलचल मचा दी है। हाल ही में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अफगानिस्तान को सबसे कड़ी चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर काबुल अपनी जमीन से पाकिस्तान पर हो रहे आतंकी हमलों को रोकने में नाकाम रहा, तो इस्लामाबाद “अफगानिस्तान के अंदर तक जाकर कार्रवाई” करने से नहीं हिचकिचाएगा। यह बयान उस वक्त आया जब दोनों देशों के बीच इस्तांबुल में वार्ता नाकाम होती नजर आ रही थी और पाकिस्तान ने बैठक से खुद को अलग करने का ऐलान कर दिया था।

लेकिन हालात में अचानक बदलाव तब आया जब तालिबान की ओर से तीखी प्रतिक्रिया और चेतावनी दी गई। उसके बाद पाकिस्तान, जो वार्ता से किनारा कर चुका था, फिर से बातचीत की मेज पर लौट आया। अफगान मीडिया ‘टोलो न्यूज’ के मुताबिक, तुर्की और कतर के मध्यस्थों के हस्तक्षेप के बाद पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल को दोबारा इस्तांबुल वार्ता में शामिल कर लिया गया। बताया गया कि पहले पाकिस्तान ने यह कहते हुए चर्चा से हटने का फैसला लिया था कि तालिबान सीमा पार हमलों को रोकने की कोई ठोस गारंटी नहीं दे रहा है।

रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अपने बयान में कहा कि पाकिस्तान ने वार्ता को लेकर पूरी ईमानदारी दिखाई, लेकिन अफगान पक्ष समझौते से बचने की कोशिश कर रहा था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि काबुल भारत के इशारों पर चल रहा है और “फितना-ए-हिंदुस्तान” अफगानिस्तान के जरिए पाकिस्तान की स्थिति कमजोर करने की कोशिश कर रहा है।

इस बीच विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की यह चेतावनी उसकी आंतरिक और बाहरी सुरक्षा चिंताओं का नतीजा है। सीमावर्ती इलाकों में हाल के महीनों में हुए कई आतंकी हमलों के बाद इस्लामाबाद पर घरेलू दबाव बढ़ गया है कि वह निर्णायक कदम उठाए। वहीं, तालिबान शासन पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि वह अपनी संप्रभुता में किसी बाहरी दखल को स्वीकार नहीं करेगा।

मौजूदा हालात में यह साफ दिख रहा है कि दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई गहरी है। हालांकि, तुर्की और कतर के प्रयासों से बातचीत का सिलसिला फिर से शुरू होना इस बात का संकेत है कि कूटनीतिक समाधान की गुंजाइश अभी भी बाकी है। लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि यदि तनाव बढ़ता गया, तो इसका असर पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र की स्थिरता पर पड़ सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »
error: Content is protected !!
नमस्कार 🙏 हमारे न्यूज पोर्टल - मे आपका स्वागत हैं ,यहाँ आपको हमेशा ताजा खबरों से रूबरू कराया जाएगा , खबर ओर विज्ञापन के लिए संपर्क करे +91 9653865111 हमारे यूट्यूब चैनल को सबस्क्राइब करें, साथ मे हमारे फेसबुक को लाइक जरूर