झीरम घाटी में 32 कत्ल, नक्सली हमला या सुपारी किलिंग:12 साल से जांच ही चल रही, पीड़ित बोले- असली कातिल अब भी बाहर


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‘मेरा बेटा मनोज सुबह सोकर उठा था। तभी तीन लोग बुलाने आए। बोले, फूल लेने जगदलपुर चलना है। बेटे ने मुझसे कहा- जगदलपुर जा रहा हूं। बस यही उससे आखिरी बात थी। मैं आखिरी बार उसका चेहरा भी नहीं देख पाई। आज भी लगता है कि वो आएगा और कहेगा- मम्मी, जल्दी से खाना दे दो।’

रंभा के बेटे मनोज को दुनिया से गए 12 साल हो गए, लेकिन बेटे का जिक्र होते ही उनकी आवाज में बेबसी महसूस होने लगती है। मनोज 25 मई, 2013 को सुकमा की झीरम घाटी में हुए नक्सली हमले में मारे गए थे। इस दिन नक्सलियों ने अंधाधुंध फायरिंग कर छत्तीसगढ़ कांग्रेस की टॉप लीडरशिप समेत 32 लोगों की हत्या कर दी थी।

2013 से 2025 आ गया, लेकिन इस हत्याकांड की जांच चल रही है। NIA, CBI, SIT के अलावा न्यायिक आयोग भी जांच करते रहे, लेकिन हमले का सच सामने नहीं आया। इस हमले की साजिश में तीन नाम सामने आए थे, हिड़मा, देवा और बसवाराजू। बीते 21 मई को सिक्योरिटी फोर्स ने बसवाराजू को अबूझमाड़ के जंगलों में मार गिराया।

झीरम हत्याकांड को कांग्रेस नेता साजिश या सुपारी किलिंग क्यों बताते हैं, पीड़ित परिवार क्यों कहते हैं कि झीरम के असली कातिल अब भी नहीं पकड़े गए, ‘नक्सलगढ़ से भास्कर’ सीरीज की इस स्टोरी में पढ़िए इन सवालों के जवाब और 4 पीड़ितों की कहानियां।

 

 

पहली कहानी मनोज की मां बोलीं- बेटे की मौत पर मुआवजा मिला, सब बहू ले गई झीरम घाटी में हुए हमले के वक्त मनोज की उम्र सिर्फ 24 साल थी। वे किराए पर गाड़ी चलाते थे। परिवार में मां रंभा और छोटे भाई हैं। सरकार से मदद के नाम पर सिर्फ 35 किलो चावल मिलता है। मनोज जो गाड़ी चलाते थे, वो हमले में बर्बाद हो गई थी। उसका मुआवजा भी सिर्फ 50 हजार रुपए मिला। परिवार दर्भा में रहता है। उनके पास अपना घर भी नहीं है।

 

रंभा बेटे की मौत को याद करते हुए बताती हैं, ‘मुझे तो पता ही नहीं था कि मनोज नहीं रहा। रात में 10:30 बजे एक पत्रकार आया और बोला दीदी ये फोटो देखो। उसमें मनोज की डेडबॉडी थी। मैं देखकर बेहोश हो गई।’

‘उसकी लाश आई तो मैं उसे देख नहीं पाई। अब भी लगता है कि वो गाड़ी लेकर आया है। हर दिन याद आता है। त्योहार में याद आता है। उसके जाने के बाद बहुत मुश्किलें झेली हैं। मनोज परिवार में अकेला कमाने वाला था। छोटा बेटा तो तब सिर्फ 14 साल का था।’

‘मनोज की शादी को सिर्फ दो महीने हुए थे। बहू ज्यादातर मायके में ही रहती थी। सरकार से दो बार 5-5 लाख और एक बार 3 लाख का चेक आया था। सब बहू ने ले लिए। चेक उसी के नाम से आया था। उसने पैसे ले लिए और लौटकर नहीं आई।’

नक्सलियों का लीडर बसवाराजू एनकाउंटर में मारा गया। क्या आपको लगता है इंसाफ हो गया? रंभा गुस्से में जवाब देती हैं, ‘अभी मेन आदमी बचा हुआ है। वो कांग्रेस का नेता था। वो कैसे हमले में बच गया। दो और लोग थे। मैं उनके नाम नहीं लूंगी। उन्हें क्यों नहीं मारा। एक को तो नक्सली बाइक पर बिठाकर थाने तक छोड़ने गए थे। इन लोगों का सच सामने आने तक हमें इंसाफ नहीं मिलेगा।’

दूसरी कहानी राजकुमार की मनोज के साथ गाड़ी में गया, फिर नहीं लौटा झीरम घाटी हत्याकांड में 17 साल के राजकुमार की भी मौत हुई थी। राजकुमार और मनोज ममेरे भाई थे। वो मनोज के साथ कांग्रेस के काफिले में गाड़ी लेकर गया था। राजकुमार 8वीं में पढ़ता था। राजकुमार की मां तारा को सरकार की तरफ से अनुकंपा पर नौकरी मिली है। 20 हजार रुपए महीना सैलरी है। सरकार से जमीन भी मिली, लेकिन उनका घर सूना है। राजकुमार तारा का इकलौता बेटा था।

तारा बताती हैं, ‘राजकुमार किसी पार्टी में नहीं था। वो तो बच्चा था। बच्चे को क्या पता रहेगा, उसे तो बस बुलाकर ले गए थे।’

तारा को बेटे की मौत की खबर एक दिन बाद मिली। वे कहती हैं, ‘शनिवार को हमला हुआ। मैं रविवार को उसकी लाश देख पाई। एक दिन तक मुझे किसी ने कुछ नहीं बताया।’

हमने तारा से भी पूछा कि क्या बसवाराजू की मौत से आपको इंसाफ मिल गया? वे मायूस होकर कहती हैं, ‘क्या करेंगे सर, उसे मारने से हमें क्या मिलेगा। मेरा बेटा तो चला गया।’

 

तीसरी कहानी सदा सिंह नाग की बेटे बोले- झीरम के शहीद के नाम पर कॉलेज बना, उसी में एडमिशन नहीं मिला जूनापारा के सदा सिंह नाग कांग्रेस में थे। वे कांग्रेस के उस काफिले में शामिल थे, जो मंजिल तक नहीं पहुंच पाया। सदा सिंह की मौत के बाद उनकी पत्नी उज्ज्वला ने अकेले दो बच्चों की जिम्मेदारी उठाई। हमले के करीब दो साल बाद उनकी बेटी को अनुकंपा पर सरकारी नौकरी मिली। यही नौकरी अब परिवार का सहारा है।

उज्जवला कहती हैं, ‘मेरे लिए इंसाफ का मतलब मुआवजा या नौकरी नहीं है। उन दोषियों को सजा मिलनी चाहिए, जो अब भी आजाद घूम रहे हैं।’

उज्जवला चुप हो जाती हैं, तो बगल में मौजूद बेटे ज्वाला सिंह उनकी बात आगे बढ़ाते हैं। ज्वाला बताते हैं, ‘पापा की मौत हुई, तब मैं 5वीं में पढ़ता था। पापा प्राइवेट स्कूल में पढ़ाते थे। पापा के जाने के बाद घर में कोई कमाने वाला नहीं था। इधर-उधर से मदद लेकर किसी तरह मां ने पढ़ाया।’

‘मैं डॉक्टर बनना चाहता हूं। रायपुर में NEET की कोचिंग ली, लेकिन एग्जाम में कुछ नंबरों से चूक गया। मैंने बस्तर में शहीद महेंद्र कर्मा यूनिवर्सिटी में एडमिशन की कोशिश की, उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि मैं दूसरी यूनिवर्सिटी से पढ़कर आया हूं।’

 

 

सरकारी मदद के नाम पर ज्वाला की बड़ी बहन अमिमा को एक हॉस्टल में फोर्थ ग्रेड की नौकरी मिली है। अमिमा की बातों में सरकार के लिए गुस्सा है।

अमिमा कहती हैं, ‘12 साल बाद भी हमें नहीं पता कि पापा को किसने और क्यों मारा। हजार बार बोला गया कि इंसाफ मिलेगा। कहां गया इंसाफ। बरसी पर हर साल सब आते हैं, फूलमाला चढ़ाते हैं। मीडिया वाले सवाल पूछते हैं। अगले दिन अखबार में छपता है कि जांच जारी है, लेकिन होता कुछ नहीं।’

नक्सली लीडर बसवाराजू के मारे जाने पर अमिमा कहती हैं, ‘यह कोई इंसाफ नहीं है। असली दोषी आज भी बाहर घूम रहे हैं।

 

 

चौथी कहानी भागीरथी नाग की बेटी बोली- अब तक जांच चल रही, इसी पर हैरानी है भागीरथी नाग कांग्रेस से जुड़े थे। उनका परिवार जूनापारा गांव में रहता है। परिवार में पत्नी और दो बेटियां हैं। बड़ी बेटी रेखा जगदलपुर में पढ़ाई कर रही हैं। कैमरे पर आए बिना वे बताती हैं, ‘हमला हुआ, तब मैं 7वीं में थी। मुझे घटना के बारे में ज्यादा याद नहीं है। मुझे इसी बात की हैरानी है कि जांच अब तक क्यों चल रही है। बार-बार एक ही बात करके हमें क्या मिलने वाला है।’

हमने भागीरथी की पत्नी इच्छावती से भी बात की। बातचीत शुरू होते ही, वे रुआंसी हो जाती हैं। कहती हैं-

जो चला गया वो वापस तो नहीं आएगा। सरकार को अब तक कार्रवाई कर देनी चाहिए थी, लेकिन ये तो नहीं हो पाया।

झीरम हत्याकांड: अनसुलझे सवाल और अधूरी जांच 2013 के आखिर में छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने थे। पिछले 2 चुनाव BJP ने बहुमत से जीते थे। रमन सिंह मुख्यमंत्री थे। 10 साल से विपक्ष में बैठी कांग्रेस जीत के लिए जोर लगा रही थी। पार्टी पूरे राज्य में परिवर्तन यात्रा शुरू करने वाली थी। 25 मई को सुकमा में परिवर्तन रैली की गई।

रैली के बाद कांग्रेस नेताओं का काफिला सुकमा से जगदलपुर जा रहा था। इसमें करीब 25 गाड़ियां थीं। इन गाड़ियों में 200 नेता-कार्यकर्ता थे।

सबसे आगे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और कवासी लखमा थे। उनके पीछे महेंद्र कर्मा और मलकीत सिंह गैदू की गाड़ी थी। उनके पीछे बस्तर के कांग्रेस प्रभारी उदय मुदलियार च

दोपहर करीब 3:40 बजे काफिला झीरम घाटी में पहुंचा। यहीं नक्सलियों ने पेड़ गिराकर रास्ता बंद कर दिया। गाड़ियां रुकते ही 200 से ज्यादा नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी। हमले में नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश की मौके पर ही मौत हो गई। करीब डेढ़ घंटे तक फायरिंग होती रही।

 

 

घने जंगलों वाली झीरम घाटी सुकमा से करीब 150 किमी दूर है। यहां जंगल इतने घने हैं कि नक्सलियों का मूवमेंट समझ नहीं आया।

 

घने जंगलों वाली झीरम घाटी सुकमा से करीब 150 किमी दूर है। यहां जंगल इतने घने हैं कि नक्सलियों का मूवमेंट समझ नहीं आया।

शाम करीब 5:30 बजे नक्सली पहाड़ों से उतरकर नीचे आए और एक-एक गाड़ी चेक की। एक गाड़ी में उन्हें सलवा जुडूम आंदोलन शुरू करने वाले महेंद्र कर्मा मिल गए। आंदोलन की वजह से नक्सली महेंद्र कर्मा को दुश्मन समझते थे। उन्होंने बेरहमी से महेंद्र कर्मा की हत्या कर दी। उन्हें करीब 100 गोलियां मारी गईं।

चश्मदीदों के मुताबिक, नक्सलियों ने कुछ नेताओं को नाम लेकर पहचाना और उन्हें गोली मारी। हमला पूरी योजना के साथ किया गया। नक्सलियों ने जगह का चुनाव, बम लगाने और भागने तक की पूरी तैयारी कर रखी थी। खुफिया एजेंसियों को हमले की कोई भनक नहीं थी।

 

झीरम घाटी में हमले के दौरान IED ब्लास्ट से एक गाड़ी का हिस्सा उड़कर नदी में जा गिरा था। ये 12 साल बाद भी वहीं फंसा हुआ है।

झीरम घाटी में हमले के दौरान IED ब्लास्ट से एक गाड़ी का हिस्सा उड़कर नदी में जा गिरा था। ये 12 साल बाद भी वहीं फंसा हुआ है।

कांग्रेस ने हमले को राजनीतिक साजिश बताकर BJP सरकार पर सुरक्षा में लापरवाही का आरोप लगाया। BJP ने आरोपों को खारिज कर कहा कि यह नक्सली हमला था।

हमले के दो दिन बाद 27 मई, 2013 को नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी यानी NIA को जांच सौंप दी गई। NIA ने सितंबर, 2014 में पहली चार्जशीट दाखिल की। एक साल बाद अक्टूबर 2015 में सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की गई। चार्जशीट के आधार पर जगदलपुर NIA कोर्ट में अब भी इस मामले का ट्रायल चल रहा है। हालांकि, NIA की जांच रिपोर्ट कभी सामने नहीं आई।

 

 

सुरक्षा चूक की जांच के लिए कमीशन बना, रिपोर्ट कभी सामने नहीं आई सुरक्षा चूक की जांच के लिए राज्य सरकार ने जस्टिस प्रशांत मिश्रा की अध्यक्षता में न्यायिक आयोग बनाया था। आयोग ने 2021 में अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार की जगह राज्यपाल को सौंपी। ये रिपोर्ट भी आज तक सामने नहीं आई। विवाद बढ़ा तो कांग्रेस सरकार ने जस्टिस सतीश के. अग्निहोत्री और जस्टिस मिन्हाजुद्दीन की अध्यक्षता में नया आयोग बनाया। हालांकि, हाईकोर्ट ने जांच पर रोक लगा दी।

 

 

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कांग्रेस की तरफ से इस केस को लड़ने वाले सीनियर वकील सुदीप श्रीवास्तव NIA की जांच पर सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं कि इसमें कुछ तो ऐसा है, जो लोगों को जानने नहीं दिया जा रहा है।

सुदीप बताते हैं, ‘NIA पहले इस केस की जांच बड़े माओवादी नेताओं के निर्देश पर हुए हमले की तरह कर रही थी। FIR में नक्सली लीडर रमन्ना और गणपति का नाम दर्ज किया गया। NIA इन दोनों को मास्टरमाइंड मान रही थी।’

‘सितंबर, 2014 में चार्जशीट दाखिल की गई, तो बताया गया कि दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी ने प्लान करके ये हमला किया था। इसके लिए टॉप लीडर्स से परमिशन नहीं ली गई थी। बाद में NIA ने गणपति और रमन्ना का नाम हटाने पर कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दिया।’

NIA ने झीरम घाटी हमले में शामिल नक्सलियों के पोस्टर आसपास के गांवों में लगाए थे। आरोपियों पर एक से 5 लाख रुपए का इनाम रखा गया, लेकिन ज्यादातर नक्सली कभी पकड़े नहीं गए।

NIA ने झीरम घाटी हमले में शामिल नक्सलियों के पोस्टर आसपास के गांवों में लगाए थे। आरोपियों पर एक से 5 लाख रुपए का इनाम रखा गया, लेकिन ज्यादातर नक्सली कभी पकड़े नहीं गए।

‘कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाए कि जांच सही तरीके से नहीं की गई। इसमें बड़ी साजिश की पड़ताल नहीं हुई। फिर छत्तीसगढ़ सरकार ने 2016 में CBI जांच का नोटिफिकेशन जारी कर दिया। केंद्र ने उसी साल इस CBI जांच को खारिज कर दिया।’

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‘2018 में राज्य में कांग्रेस की सरकार आई, तो उसने हमले की जांच के लिए SIT बनाई। NIA ने इसका विरोध किया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद SIT को जांच की इजाजत मिली। तब तक राज्य में सरकार बदल चुकी थी। इसी खींचतान में हमले का सच कभी सामने ही नहीं आया।’

‘मई 2020 में उदय मुदलियार के बेटे जितेंद्र मुदलियार ने जगदलपुर में FIR दर्ज करवाई। इसमें साजिश की जांच करने की मांग की गई। इस FIR के खिलाफ NIA कोर्ट चली गई। निचली अदालत में NIA की मांग खारिज कर दी गई। NIA हाईकोर्ट चली गई।’

लंबी सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने NIA की अपील खारिज कर दी। NIA सुप्रीम कोर्ट चली गई। नवंबर, 2023 में सुप्रीम कोर्ट में तब के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने NIA की अपील खारिज कर दी। इससे छत्तीसगढ़ पुलिस को झीरम हत्याकांड की जांच करने की अनुमति मिल गई।’

सुदीप कहते हैं, ‘सुप्रीम कोर्ट के फैसले के वक्त राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। एक महीने बाद BJP की सरकार आ गई। इसके बाद जांच का कुछ नहीं हुआ।’

 

 

हमले में बचे कांग्रेस नेता बोले- ये सुपारी किलिंग हमले में बस्तर के कांग्रेस नेता मलकीत सिंह गैदु की जान बच गई थी। वे छत्तीसगढ़ कांग्रेस के महामंत्री हैं। मलकीत हमले को साजिश बताते हुए इसे ‘सुपारी किलिंग’ कहते हैं। वे कहते हैं, ‘पहली बार ऐसा हुआ था कि नक्सलियों ने हमले का न वीडियो जारी किया, न जिम्मेदारी ली। इसलिए मैं शुरुआत से इस हमले को सुपारी किलिंग कहता रहा हूं।’

मलकीत कहते हैं, ‘NIA की जांच में क्या निकला, ये सामने आना चाहिए। पता चलना चाहिए कि कौन दोषी है। या SIT को जांच की अनुमति मिलनी चाहिए। ये पूरी घटना शक के दायरे में है।’

 

 

 

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